जंतर मंतर पर हुए दो बड़े आंदोलनों ने छात्र राजनीति, लोकतांत्रिक अधिकारों और विरोध की ताकत पर नई बहस छेड़ी है। आंदोलन की सफलता और विरोध की नई परिभाषा पर एक्टिविस्ट और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेशनल प्रेजिडेंट नेहा बोरा से बातचीत की कात्यायनी उप्रेती ने:Q. विपक्षी नेताओं के साथ मंच साझा करना क्या राजनीतिक तालमेल की शुरुआत है?
यह बहुत अच्छी बात है कि विपक्षी पार्टियों के प्रतिनिधि भी सड़कों पर उतर रहे हैं। उन्हें तो हमेशा से लोगों के मुद्दे पर सड़कों पर होना चाहिए था। जहां तक कांग्रेस के साथ आगे राजनीतिक तालमेल की बात है, तो मैं आइसा में हूं, हमारी अपनी विचारधारा और राजनीति है। हम लोग साथ हैं क्योंकि इस समय लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई में साथ खड़े हैं।Q. क्या हर मुद्दे के लिए सड़कों पर उतरना जरूरी है?
हां, सड़कों पर उतरना ही पड़ेगा। हर दौर के इतिहास ने हमें यही बताया है कि बड़े बदलाव सड़कों के संघर्ष से आए हैं। चाहे किसान आंदोलन हो, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग वाला आंदोलन हो या कोई दूसरा, बदलाव सड़कों से आया है।
Q. जंतर मंतर पर हाल में दो आंदोलन हुए, जिनकी आवाज पूरे देश में गूंजी? कितना सफल मानती हैं?
आंदोलन सिर्फ अपनी मांगों तक सीमित नहीं होता, उससे कहीं ज्यादा होता है। सवाल उठ सकता है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर आपने क्या हासिल कर लिया? उनकी जगह कोई दूसरा आ गया। ऐसा तो नहीं है कि वह बहुत बेहतर है। लेकिन मूवमेंट ने आसपास के लोगों को प्रभावित किया। लोगों ने यह समझा कि बीजेपी सत्ता में है, तो ऐसा नहीं है कि वह जो चाहे कर सकती है। समझ आया कि अगर कुछ गलत होता है, तो लोग सवाल पूछेंगे।जंतर मंतर आंदोलन के बाद देखा कि स्कूल के स्टूडेंट्स तक सड़कों पर आकर कहने लगे कि हमारी लैब ठीक करो, डेस्क ठीक करो। हमने नालसर, रांची, बिहार में स्टूडेंट्स के प्रदर्शन देखे। साथ ही, हम देख रहे हैं कि जो SBM आदेश पास कर रहा है या कोर्ट में जिस तरीके के बयान दिए जा रहे हैं, वह मौजूदा राजनीतिक माहौल को दिखाते हैं। यह भी देखने को मिल रहा है कि अब कुछ जजों के रुख में अचानक बदलाव दिख रहा है, तो यह भी दिख रहा कि जज पूछ रहे हैं कि आपकी उम्र क्या है, आप तो जेन Z नहीं हैं।
Q. आप डटकर विरोध करती हैं... वह अंदाज वायरल है। क्या कहेंगी?
हम लेफ्ट के एक्टिविस्ट हैं। हमें यह विरासत में मिला है। हमसे पहले की जितनी पीढ़ियों की लीडरशिप रही है, उन सबने भी यह किया है। हमारे लिए यह दूध-भात है।
Q. क्या मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा ही हल होगा?
मैं ऐसा नहीं मानती कि ज्ञानेश कुमार चले जाएंगे तो काम बन जाएगा, क्योंकि उनके पास बहुत सारे ज्ञानेश हैं। सबसे जरूरी है कि SIR की पूरी प्रक्रिया पर रोक लगे। जिन 13 करोड़ लोगों के मताधिकार प्रभावित हुए हैं, उनके वोट देने के अधिकार बहाल किए जाएं। साथ ही, 2023 का एक्ट आता है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया बदली गई। लोकतंत्र का आधार यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइजी और निष्पक्ष चुनाव हैं।Q. क्या आंदोलन की भाषा और अंदाज बदल रहे हैं?
हर आंदोलन, जिसका जनाधार बड़ा होता है और गतिशील होता है, उसकी अपनी भाषा होती है। दमन के बावजूद लोग जिस हिम्मत से विरोध कर रहे हैं, वही इस आंदोलन की भाषा है। इस आंदोलन में पुलिस की तैयारी, नागरिक स्वतंत्रताओं पर कार्रवाई और लोगों के अधिकारों को सीमित करने की कोशिशें शामिल हैं। ट्रेनें रद्द होना, मेट्रो स्टेशन बंद होना और करीब 40 हजार सुरक्षाकर्मियों की तैनाती लोगों ने देखी है। प्रतिरोध, साहस और एकजुटता इस आंदोलन को परिभाषित करते हैं।Q. आज आपको लोग यूथ आइकॉन के तौर पर देख रहे हैं? क्या सोचती हैं?
हमने एक देश के तौर पर बहुत उम्मीदें रखी हैं। बहुत हिंसा और दमन देखा है। ऐसे में हम कुछ सिंबल तलाशते हैं, जिनके जरिये हम खुद को तलाशें और अपने आसपास के लोगों को यह समझा सकें कि अभी भी कुछ बेहतर हो सकता है। इस प्रक्रिया में संगठन, लोग, गाने और कविताएं सिंबल बन जाते हैं। एक्टिविस्ट्स के बारे में रील्स और वीडियो बनाए जाते हैं, मेरे बारे में भी बनाए जा रहे हैं। लोग ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि वे उस मेहनत और हिम्मत को महसूस करते हैं। उनके भीतर भी बदलाव की इच्छा होती है। ये मीम्स, रील्स हमारे सामूहिक प्रतिरोध के सिंबल हैं।