भारत के मिसाइल डील से क्यों हिले रूस और चीन? ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान ने खरीदा आकाश डिफेंस सिस्टम

Updated on 06-10-2026 12:28 PM
बीजिंग/मॉस्को: पिछले साल मई में पाकिस्तान के खिलाफ संघर्ष के बाद दुनिया के कई देशों में भारतीय ब्रह्मोस और आकाश मिसाइल सिस्टम खरीदने की रेस लग गई है। भारत सरकार ने पुष्टि कर दी है कि मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान ने आकाश मिसाइल एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा है। आकाश सिस्टम ने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी क्षमता साबित कर दी थी और अब ये एक युद्ध में भाग ले चुका सिस्टम बन चुका है। जबकि इंडोनेशिया ब्रह्मोस के लिए डील कर चुका है, फिलीपींस खरीद चुका है और वो नये ऑर्डर भी देने वाला है। यूएई और भारत के बीच भी ब्रह्मोस मिसाइल सौदे पर बातचीत आखिरी चरण में पहुंच चुकी है।

लेकिन ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान डील बहुत अलग मायने रखता है। इससे भारत को मध्य एशिया में अपनी पैठ बनाने में मदद मिली है क्योंकि ये क्षेत्र पहले रूस हथियारों का खरीददार था और पिछले कुछ सालों से चीन वहां हथियारों की सप्लाई कर रहा था लेकिन अब दो बड़े मध्य एशिआई देशों ने भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम पर भरोसा जताया है। भारतीय रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पिछले गुरुवार को इन नई बिक्री की पुष्टि की है। उन्होंने 'आकाश' को 'हमारी सफलताओं में से एक' बताते हुए यह भी संकेत दिया कि कुछ और देशों में भी इसको लेकर गहरी दिलचस्पी है।

युद्ध में अपनी क्षमता साबित कर चुका है आकाश एयर डिफेंस सिस्टम

  • भारतीय रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह 100 मीटर से 20 किलोमीटर की ऊंचाई तक हवाई लक्ष्यों को भेद सकती है और इसकी ऑपरेशनल रेंज 4.5 किलोमीटर से 25 किलोमीटर है।
  • 5.87 मीटर लंबी हर मिसाइल का वजन लगभग 710 किलोग्राम है और यह लक्ष्यों को लॉक करने के लिए कमांड गाइडेंस का इस्तेमाल करती है।
  • 'आकाश' प्रोग्राम को 'आकाश प्राइम' और 'आकाश-NG' जैसे नए वर्ज़न के साथ अपडेट भी किया गया है जिनमें बेहतर सेंसर और अन्य सुधार शामिल हैं। आर्मेनिया पहले से ही आकाश सिस्टम को ऑपरेट करता है।
साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट में नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम के फेलो अतुल कुमार ने कहा कि 2022 में आर्मेनिया 'आकाश' का पहला अंतरराष्ट्रीय ग्राहक बना। आर्मेनिया इस सिस्टम की कम कीमत, रूस से सप्लाई में कमी और प्रतिद्वंद्वी अजरबैजान के बढ़ते ड्रोन बेड़े की वजह से इसकी ओर आकर्षित हुआ था। कुमार ने कहा कि ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के लिए इस सिस्टम को हासिल करना रूस और चीन के अलावा अन्य देशों से भी डिफेंस सप्लाई लेने का एक तरीका था।
उन्होंने कहा 'तुर्कमेनिस्तान पहले ही कई चीनी एयर-डिफेंस सिस्टम हासिल कर चुका है और उम्मीद है कि 'आकाश' उसके एयर-डिफेंस आर्किटेक्चर में मिड-लेयर की भूमिका निभाकर उन्हें और बेहतर बनाएगा।' कुमार ने कहा कि रूस के लिए भारत का मध्य एशियाई डिफेंस मार्केट में आना शायद उस स्थिति से बेहतर है जिसमें यह इलाका नाटो या चीनी मिलिट्री स्टैंडर्ड्स के करीब चला जाए।

चीन की पश्चिमी सीमा के पास कैसे पहुंच रहे भारतीय हथियार

अतुल कुमार ने ये भी कहा कि चीन की पश्चिमी सीमा के पास भारतीय मिलिट्री हार्डवेयर की मौजूदगी बीजिंग के लिए अच्छी बात नहीं होगी खासकर इसलिए क्योंकि वह खुद को इस इलाके में पसंदीदा मिलिट्री सप्लायर के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। कुमार ने कहा 'भारत अलग-अलग पॉलिसी पहलों, इंसेंटिव और डिफेंस कॉरिडोर के जरिए डिफेंस एक्सपोर्ट को बढ़ावा दे रहा है और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ा रहा है।'

रूस से अपनी निर्भरता क्यों घटा रहे मध्य एशियाई देश?

यूक्रेन युद्ध ने रूस की हथियार बेचने की क्षमता को गंभीर रूप से कम कर दिया है। हालांकि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के डेटा से पता चलता है कि क्रेमलिन अभी भी मध्य एशिया में हथियारों का मुख्य सप्लायर बना हुआ है लेकिन देश तेजी से दूसरे विकल्पों की तरफ जा रहे हैं। चीन भी तेजी से आगे बढ़ रहा है खासकर उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान में।

इंस्टीट्यूट के डेटा के मुताबिक 2020 और 2024 के बीच रूस के हथियारों के कुल एक्सपोर्ट का 11 प्रतिशत हिस्सा कज़ाकिस्तान ने खरीदा जबकि ताजिकिस्तान अभी भी रूसी उपकरणों और सैन्य मदद पर काफी हद तक निर्भर है। वहीं दूसरी तरफ आर्मेनिया रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता तेजी से कम कर रहा है और भारत और फ्रांस जैसे नए सप्लायर्स की ओर रुख कर रहा है।

'आकाश' क्यों मध्य एशियाई देशों के लिए शानदार विकल्प बना?

दिल्ली स्थित 'मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस' के रिसर्च एनालिस्ट राहुल वानखेड़े ने कहा कि आकाश मिसाइल सिस्टम पश्चिमी देशों के विकल्पों की तुलना में बहुत कम कीमत पर बेहतरीन एयर डिफेंस क्षमताएं देता है। वानखेड़े ने कहा 'इस सिस्टम को घरेलू मैन्युफैक्चरिंग लाइनों का समर्थन हासिल है... और भारत की अपनी सेनाओं ने भी इसके लिए अतिरिक्त ऑर्डर दिए हैं। इसलिए इससे संभावित खरीदारों को सप्लाई चेन की विश्वसनीयता, जरूरत पड़ने पर तुरंत सप्लाई और ट्रेनिंग का पूरा पैकेज मिलने का भरोसा मिलता है।'
वानखेड़े ने कहा कि अपने हथियारों के अलावा भारत ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों को रूस में बने सिस्टम के लिए भी मदद दे सकता है। जिससे दोनों पक्षों को दोहरा फायदा होता है। उन्होंने कहा कि चीन, रूस या अमेरिका के उलट, भारत हथियारों की बिक्री के जरिए दूसरे देशों को खुद पर निर्भर नहीं बनाना चाहता। यही बात इसे उन देशों के लिए एक आकर्षक पार्टनर बनाती है जो अपने रणनीतिक रिश्तों में संतुलन बनाना चाहते हैं।

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