वोट बैंक तो हैं पर जातियों में बंटे होने के कारण दबाव नहीं बना पाते किसान

Updated on 05-09-2023 12:59 PM

भोपाल। यूं देखा जाए तो हमारे किसान सबसे बड़ा वोट बैंक हैं पर संगठित नहीं हैं। जातियों में बंटे हैं और जब चुनाव आता है तो अपने हित की बात को छोड़कर जाति के पीछे चल देते हैं। यही कारण है कि उनकी आवाज भी उस बुलंदी को नहीं छू पाती है जिससे सरकारों को उनके हित में कदम उठाने मजबूर होना पड़े। अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देने के बावजूद किसानों की बदहाली किसी से छुपी नहीं है।

कृषि क्षेत्र का योगदान 23 प्रतिशत के आसपास

बड़ा कारण इनका संगठित न होना

प्रदेश के एक करोड़ 11 लाख किसान और उससे जुड़े लोगों को देखें तो यह सबसे बड़ा वर्ग है, जो न केवल चुनाव परिणाम को जिस ओर चाहे उस तरफ मोड़ सकता है बल्कि सरकारों को भी अपने हित में कदम उठाने के लिए मजबूर करने की ताकत रखता है पर ऐसा होता नहीं है। इसका बड़ा कारण इनका संगठित न होना है। किसान जब कभी भी चुनाव आते हैं तो जाति-समुदाय को आगे रखते हैं, जबकि इनका नेटवर्क सबसे बड़ा है।

सहकारी समितियों के माध्यम से 40 लाख किसान जुड़े

साढ़े चार हजार सहकारी समितियों के माध्यम से 40 लाख किसान जुड़े हुए हैं। अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान होने के बावजूद किसान आर्थिक तौर पर कमजोर है। जबकि, फसल क्षेत्र 5.46 प्रतिशत बढ़ा है। धान के क्षेत्र में बीते एक वर्ष में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पिछले दस वर्ष में धान का औसत उत्पादन 80.87 लाख टन रहा है।

इसी तरह गेहूं का औसत उत्पादन बीते दस वर्षों में 245.89 लाख टन और मक्का का 36.93 लाख टन रहा है। दालों में देखें तो पिछले दस वर्षों में चना का उत्पादन 35.83, उड़द का 7.35 और मसूर का औसत उत्पादन 4.78 टन रहा है। सरसों, सोयाबीन और कपास में भी यही स्थिति है। इसके बाद भी किसानों की स्थिति में अधिक सुधार परिलक्षित नहीं होता है। 11 लाख 97 हजार किसान समय पर ऋण न चुकाने के कारण अपात्र हो गए थे। इन्हें न तो बिना ब्याज का ऋण मिल रहा था और न ही सहकारी समितियों से खाद-बीज।

ब्याज माफी से सुधरी हालत

सरकार ने ब्याज माफी दी, तब कहीं जाकर ये किसान सरकारी सुविधा लेने के लिए पात्र हुए हैं। किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार न होने के कई कारण हैं। बीज को लेकर अभी भी किसानों की निर्भरता बाजार पर है।सहकारी क्षेत्र में बीज उत्पादन को प्रोत्साहित करने के कदम तो उठाए गए पर ये नाकाफी सिद्ध हुए। बीज निगम का दायरा भी सीमिति होता जा रहा है।

बीजों की गुणवत्ता का प्रश्न भी बड़ा है। नमूने लेकर जब तक जांच की प्रक्रिया पूरी होती है, तब तक खेल खत्म हो चुका होता है। यही स्थिति खाद और कीटनाशक के साथ भी है लेकिन किसान वैसे लामबंद नहीं हो पाते हैं, जैसे अन्य वर्ग हो जाते हैं, इसलिए उनके हित से जुड़े निर्णय भी जल्दी-जल्दी लिए जाते हैं क्योंकि सबको यह पता होता है कि यदि इनकी सुनवाई नहीं हुई तो नुकसान हो जाएगा।

बंटे हैं जाति, पंथ व संप्रदाय में

राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा का कहना है कि यह बिल्कुल सही है कि किसान और गांव को जाति, पंथ, संप्रदाय में बंटे हैं। पहले से इन्हें बांटकर रखा गया है ताकि ये संगठित न हो पाएं। जातिवाद का दौर है और किसान-मजदूर भी इससे अछूते नहीं हैं। जबकि, हम इस बात के पक्षधर है कि किसान और मजदूर की कोई जाति नहीं होती है। वो अनाज का उत्पादन करके देश के नागरिकों के पेट भरने का काम करता है। कोई भी सरकार कभी यह नहीं कहती है कि फलां जाति के किसान को यह सुविधा दे रहे हैं। वो कहती है कि किसान के लिए यह किया जा रहा है। किसानों को भी इस बात को समझना होगा, तभी परिणाम आएंगे।


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