आदमपुर कचरा खंती का संकट गहराया, 7 लाख टन कचरे से 10 गांवों का भूजल दूषित, सांस लेना मुश्किल

Updated on 07-07-2026 08:18 PM

राजधानी भोपाल से निकलने वाले कचरे के वैज्ञानिक निष्पादन के लिए बनाई गई आदमपुर कचरा खंती अब आसपास के 10 गांवों के लोगों के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है। यहां वैज्ञानिक निष्पादन की जगह सात लाख टन कचरे का पहाड़ खड़ा हो गया है।

कचरे से निकलने वाले लीचेट ने भूजल को दूषित कर दिया है, जबकि बदबू और धुएं से लोगों का सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। हालात ऐसे हैं कि कई गांवों में नगर निगम को टैंकरों और सार्वजनिक पानी की टंकियों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराना पड़ रहा है।

सात लाख टन कचरे का पहाड़

  • राजधानी से निकलने वाले कचरे के वैज्ञानिक निष्पादन के लिए बनाई गई आदमपुर कचरा खंती अब आसपास के 10 गांव के लोगों के लिए मुसीबत बन चुकी है। यहां कचरे का वैज्ञानिक निष्पादन होने की जगह सात लाख टन कचरे का पहाड़ बन चुका है और इससे आने वाली बदबू की वजह से आसपास के गांवों के लोगों का सांस लेना भी मुश्किल हो गया है।
  • कचरे के दूषित पानी (लीचेट) का रिसाव भी कचरा खंती से बाहर बह रहा है। इसकी वजह से आसपास के कई गांवों का भूजल भी दूषित हो चुका है। ऐसे में यहां के पानी को पीना तो दूर इसे नहाने सहित अन्य रोजमर्रा के कामों में भी उपयोग नहीं किया जा सकता। कचरा खंती की वजह से इन गांवों में पहले से लगे ट्यूवबेल, हैंडपंप और कुओं का पानी भी खराब हो चुका है।

  • हरिपुरा-अर्जुन नगर, पड़रिया, शांति नगर, कोलुआ जैसे गांवों में नगर निगम को इन गांवों में टैंकरों और सार्वजनिक पानी की टंकियों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से यह व्यवस्था चल रही है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम दिखाई नहीं देता।
  • दूसरी ओर, कचरे के पहाड़ में समय-समय पर लगने वाली आग लोगों के लिए नई मुसीबत बन जाती है। आग लगने पर कई किलोमीटर तक फैलने वाला धुआं आंखों में जलन, गले में खराश, सांस लेने में तकलीफ और एलर्जी जैसी समस्याएं पैदा करता है। सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों, बुजुर्गों और पहले से अस्थमा या अन्य श्वास रोगों से पीड़ित लोगों को होती है।
  • ग्रामीण बोले- पीने लायक नहीं बचा पानी

    पहले घर के हैंडपंप से पानी भरकर पी लेते थे, लेकिन अब वह पानी पीना तो दूर, घरेलू काम के लायक भी नहीं बचा है। नगर निगम टैंकरों के माध्यम से पानी आपूर्ति करता है, लेकिन 100 परिवारों पर 10,000 लीटर की एक टंकी रखी गई है।

    उसे भी दो से तीन दिन में आधा ही भरा जाता है। ऐसे में इस पानी से काम नहीं चल पाता है। कई दिन पानी नहीं आने से दूसरे गांवों से पानी लाना पड़ता है। हवा दूषित होने की वजह से सांस लेने में भी परेशानी होने लगती है, लेकिन अब तो इस दुर्गंध के साथ रहना सीख लिया है।

    नन्नूलाल सिसोदिया, रहवासी, शांति नगर


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