इस्लामिक दुनिया का 'सिक्योरिटी गार्ड' बनना चाहती है पाकिस्तानी सेना, दिवालिया कर सकती है मुनीर की सनक
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24-09-2026 12:09 PM
इस्लामाबाद: पाकिस्तान ने मक्का समझौते के जरिए सऊदी अरब और तुर्की के साथ रक्षा संबंध मजबूत किए हैं। साथ ही खाड़ी देशों की सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाने की उसकी कोशिश भी साफ दिख रही है। इस्लामाबाद ने अपने लड़ाकू विमान और ड्रोन बेचकर खुद को मुस्लिम दुनिया के लिए सुरक्षा साझेदार के तौर पर पेश किया है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि अपनी सैन्य ताकत के दम पर उसे ग्लोबल मंच पर बड़ी जगह मिल सकती है। पाकिस्तान की महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं तो साथ ही यह सवाल भी है कि क्या उसकी सेना और अर्थव्यवस्था वास्तव में ये बोझ उठा सकती है।
पाकिस्तान एक तरफ अपनी रणनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ उसे 7 अरब डॉलर के इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) प्रोग्राम के तहत काम करना पड़ रहा है। इसके बावजूद इस साल रक्षा खर्च 18% बढ़ाकर 3 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपए कर दिया गया, जबकि विकास कार्यों के लिए फेडरल खर्च को घटाकर 1 ट्रिलियन रुपए कर दिया गया। साफ है कि असीम मुनीर की मुस्लिम दुनिया को सुरक्षा देने की चाह उनके देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकती है।
क्षेत्रीय अनिश्चितता के चलते रक्षा खर्च में बढ़ोतरी जरूरी है। देश का रक्षा खर्च इसलिए बढ़ाया गया है ताकि पाकिस्तान को 'अजेय' बनाया जा सके।
पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब
द्विपक्षीय संबंधों से त्रिपक्षीय रक्षा समझौते तक
पाकिस्तान की बढ़ती सुरक्षा भूमिका का सबसे बड़ा प्रतीक सऊदी अरब और तुर्की के साथ उसका नया रक्षा समझौता है। अगस्त में इन तीनों इस्लामिक देशों ने NATO की तर्ज पर मक्का समझौता किया। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर भी सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। समझौते पर 7 अगस्त को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए।
इस व्यवस्था में तीन ऐसे देश एक साथ आए हैं, जिनकी ताकतें बहुत अलग-अलग हैं। पाकिस्तान के पास बड़ी और युद्ध का अनुभव रखने वाली सेना है और वह मुस्लिम दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियार वाला देश है। सऊदी अरब के पास वित्तीय संसाधन हैं और अरब दुनिया में उसका काफी प्रभाव है। तुर्की के पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना और तेजी से बढ़ता रक्षा उद्योग है। कागज पर यह मेल बहुत मजबूत लगता है।
कई देशों के संपर्क में पाकिस्तान
पाकिस्तान के सामने अपनी सुरक्षा चुनौतियां हैं, आर्थिक स्थिति मुश्किल है और सेना कई मोर्चों पर उलझी हुई है। पाकिस्तान हथियारों का विक्रेता भी बनना चाहता है। इस्लामाबाद की नई रक्षा कूटनीति का एक और पहलू भी है। पाकिस्तान सिर्फ सैन्य हार्डवेयर का खरीदार या सैनिकों और सुरक्षा विशेषज्ञता का प्रदाता बनकर नहीं रहना चाहता। वह तेजी से रक्षा निर्यातक बनना चाहता है।रॉयटर्स ने जनवरी में रिपोर्ट दी थी कि पाकिस्तान संभावित रक्षा बिक्री को लेकर 13 देशों के साथ बातचीत कर रहा है, जिनमें से छह से आठ बातचीत एडवांस स्टेज में बताई गई हैं। इन बातचीत में JF-17 फाइटर जेट, ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट, ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और बख्तरबंद गाड़ियां शामिल थीं। रिपोर्ट में संभावित ग्राहकों में सऊदी अरब, इंडोनेशिया, सूडान, नाइजीरिया, मोरक्को और इथियोपिया हैं। पाकिस्तान ने बांग्लादेश और इराक के साथ भी वार्ता की बात मानी है।
पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किल
पाकिस्तान के सामने एक बड़ी समस्या है। दरअसल डिफेंस एक्सपोर्ट से अच्छा रिटर्न मिलने में कई साल लग सकते हैं, जबकि आधुनिक सेना को बनाए रखने का खर्च तुरंत उठाना पड़ता है। घरेलू खर्च डिफेंस के लिए तय बजट से कहीं ज्यादा है। पाकिस्तान का 3 ट्रिलियन PKR का डिफेंस बजट देश की सुरक्षा से जुड़े कुल खर्च का सिर्फ एक हिस्सा है।अर्थव्यवस्था को एक ही समय में कर्ज चुकाने, सरकारी कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन, एनर्जी सब्सिडी और इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च उठाना होता है। साथ ही IMF की शर्तों को भी पूरा करना होता है। 2026-27 के बजट में 7.02 ट्रिलियन रुपए के फेडरल घाटे का अनुमान है। प्रांतों के अनुमानित सरप्लस को ध्यान में रखने के बाद फिस्कल डेफिसिट 5.23 ट्रिलियन रुपए है, जो GDP का 3.6% है।
संतुलन साधने की चुनौती
पाकिस्तान खुद को पश्चिम एशिया में खासकर वॉशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, साथ ही रियाद के प्रति अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को मजबूत कर रहा है। यह एक बहुत जटिल राजनयिक भूमिका है। इस्लामाबाद को ईरान को नाराज किए बिना सऊदी अरब को भरोसा दिलाना है। साथ ही चीन के साथ संबंधों को नुकसान पहुंचाए बिना अमेरिका के साथ रिश्ते बनाए रखने हैं।खतरा यह है कि सीमित संसाधनों वाला पाकिस्तान उन प्रतिबद्धताओं को तेजी से बढ़ा सकता है, जिन्हें पूरा करने की क्षमता उसमें नहीं है। पाकिस्तान के पास बड़ी सेना है और उसका सैन्य खर्च बढ़ रहा है। इसके बावजूद अपने मुख्य क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों के रक्षा बजट की तुलना में यह अभी भी बहुत कम है। 2025 में पाकिस्तान का सैन्य खर्च 11% बढ़कर 11.9 अरब डॉलर हो गया। वहीं भारत का खर्च 92.1 अरब डॉलर और सऊदी अरब का 83.2 अरब डॉलर रहा। ये आंकड़े पाकिस्तान की रणनीति को सही परिप्रेक्ष्य में दिखाते हैं। वह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के खर्च की बराबरी करके असल में मुकाबला नहीं कर सकता। इसके बजाय उसने किफायती प्लेटफॉर्म खोजने, चीनी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने, घरेलू प्रोडक्शन बढ़ाने और रणनीतिक असर डालने के लिए अपने मिलिट्री संबंधों का इस्तेमाल करने का रास्ता चुना है।
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