मां-बहन की अपील पर पॉक्सो जज की खिंचाई:आदेश में सजा कहीं एक,कहीं दो साल लिखी, हाईकोर्ट ने कहा- जज के खिलाफ एक्शन हो

Updated on 10-09-2025 03:09 PM

भोपाल के शाहजहांनाबाद की एक मल्टी में 5 साल की मासूम के साथ दुष्कर्म और हत्या के बहुचर्चित मामले में पॉक्सो कोर्ट की जज कुमुदिनी पटेल के आदेश ने उन्हें मुश्किल में डाल दिया है। ट्रायल कोर्ट के फैसले में मुख्य आरोपी की आरोपी मां बहन की सजा की अवधि कहीं एक साल और कहीं दो साल लिखी गई है।

हाई कोर्ट ने इसे गंभीर अनियमितता और न्यायाधीश की लापरवाही माना। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि यह मामला चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए, ताकि प्रशासनिक स्तर पर जज के खिलाफ कार्रवाई हो सके।

दरअसल, ट्रायल कोर्ट ने मुख्य आरोपी अतुल निहाले को फांसी की सजा सुनाई थी। वहीं, अतुल की मां बसंती बाई और बहन चंचल को साक्ष्य छुपाने के लिए एक-एक साल की सजा दी गई। आदेश की अंतिम तालिका में सजा को दो-दो साल दिखाया गया।

जुर्माने की राशि न अदा करने पर अंदर की सजा 1 महीने व बाहर 3 माह कर दी गई। आरोपी 27 सितंबर 2024 को गिरफ्तार हुए 10 मार्च 2025 को सजा सुनाई गई।

हाई कोर्ट ने माना- यह टाइपिंग की गलती नहीं

हाई कोर्ट ने नोट किया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश के पैरा 145 में बसंती बाई और चंचल बाई को एक-एक साल की सजा दी गई थी। इसी पैरा में चंचल बाई के तीन बच्चे और बसंती बाई की वृद्धावस्था का जिक्र भी था। लेकिन पृष्ठ क्रमांक 78-79 में बनाई गई टेबल में दोषियों के नाम और सजा का उल्लेख अलग था। वहाँ सजा एक साल की जगह दो साल लिखी गई थी। इतना ही नहीं, सजा का वारंट भी दो साल के लिए तैयार किया गया था।

पहले भी ऐसे मामले हुए

  • 2022: भोपाल पॉस्को केसः सजा 10 साल लिखी, आदेश में 7 साल। हाई कोर्ट ने स्पष्टीकरण लिया, फैसला सुधारा, जज को चेतावनी।
  • 2019: इंदौर मर्डर केसः सजा आजीवन, अवधि गलत। सुप्रीम कोर्ट तक अपील, केवल संशोधन हुआ।
  • 2024: ग्वालियर रेप केसः आरोपी का नाम गलत। हाई कोर्ट ने रेक्टीफाइड किया, ट्रायल दोबारा नहीं हुआ।

जानिए भास्कर एक्सपर्ट क्या कहते है?

पैनल- रितम खाटे. चरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट सीपी श्रीवास्तव, वरिष्ठ अधिवक्ता, भोपाल

क्या केस खत्म होगा?

सीआरपीसी की धारा 362 के तहत फैसला एक बार लिखने के बाद बदलना मुश्किल है। अगर टाइपिंग एरर या आदेश में अस्पष्टता है, तो धारा 465 के तहत इसे सुधार सकते हैं। 80% मामलों में केस बरकरार रहता है और सिर्फ संशोधन होता है। अगर असंगति आरोपी के पक्ष में साबित हुई, तो राहत मिल सकती है, पर पूरा केस खत्म नहीं होता।

फैसला फिर से लिखा जाएगा?

हां, फैसला रेक्टीफाइड या क्लेरिफाइड हो सकता है। सीआरपीसी धारा 201 व सिविल प्रक्रिया संहिता ऑर्डर 20 रूल 3 के तहत जज स्वयं सुधार सकते है या हाई कोर्ट निर्देश दे सकता फैसला सप्लीमेंट्री जजमेंट के साथ फिर लिखा जाएगा, मूल तारीख बनी रहेगी।

क्या ट्रायल फिर से चलेगी?

नहीं, मामला फैसले की व्याख्या का है, सबूत या गवाहों का नहीं। आरोपी अपील करता है, तो सजा पर बहस होगी, पर गवाही दोबारा नहीं होगी।

जज पर कार्रवाई हो सकती है?

जजेस (प्रोटेक्शन) एक्ट 1985 और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत केवल दुर्व्यवहार सिद्ध होने पर कार्रवाई होती है। लापरवाही साबित होने पर एडवर्स एंट्री रिकॉर्ड में दर्ज हो सकती है, प्रमोशन प्रभावित हो सकता है। हालांकि, 90% मामलों में चेतावनी जारी होती है।



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