
चीनी हलवाई, यह नाम बड़ा अटपटा है, लेकिन लोग इसी नाम से जानते हैं। बचपन से गरीब थे, इसलिए ज्यादा पढ़-लिख नहीं सके और ठेले पर बेड़ई बेचने लगे। लोगों को उनकी बेड़ई का स्वाद इतना अच्छा लगा कि भीड़ जुटने लगी। आमदनी बढ़ी तो ठेला हटाकर दुकान बना ली। उसके बाद उनकी देखा-देखी अन्य दुकानदार भी बेड़ई बनाने लगे, लेकिन उनकी नकल कोई नहीं कर सका। आज भी दूर-दूर से लोग इनकी दुकान पर बेड़ई खाने आते हैं। यह बात दैनिक भास्कर से शेयर करते हुए स्व. किशनलाल मंगल उर्फ चीनी हलवाई के बड़े बेटे सुमित उर्फ रिंकू मंगल ने बताई।
मुरैना के रेलवे स्टेशन के ठीक बगल में चीनी हलवाई की दुकान है। दुकान भी छोटी-मोटी नहीं, बल्कि लगभग पचास फीट चौड़ी। दुकान के बाहर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा है चीनी हलवाई। दुकान सुबह सवा छह बजे खुल जाती है और सात बजे से बेड़ई मिलना शुरू हो जाता है। स्टेशन पर आने वाले मुसाफिर तो दुकान पर बेड़ई खाने आते ही है, इसके साथ ही कुछ परमानेंट लोग हैं, जो सुबह होते ही नाश्ता करने दुकान पर आ पहुंचते हैं।
हम भी सुबह सवा 6 बजे दुकान पर पहुंचे तो देखा कि शटर खुल ही रहा था। दुकान की साफ-सफाई के बाद देखा तो दो परातों में उबले आलू मसले हुए रखे थे, कारीगर सुनील प्रजापति ने बताया कि यह आलू समोसे के लिए हैं। उसके बाद डालडा गर्म होने गैस की छोटी भट्टी पर रखा गया और बड़ी भट्टी में कोयला डालकर उसे सुलगाया। इसी बीच एक ड्रम से आटा निकालकर गूंथा जाने लगा।
हर कारीगर की अलग-अलग जिम्मेदारी
आमतौर पर दुकानों में दो-चार ही कारीगर होते हैं, लेकिन चीनी हलवाई की दुकान में दर्जनभर से अधिक कारीगर हैं। सभी परमानेंट कारीगर हैं, जो कई सालों से काम कर रहे हैं। सभी कारीगरों का काम बंटा हुआ है। ये नियत समय पर आकर अपने-अपने काम में लग जाते हैं, जबकि दुकान के मालिक सुमित मंगल सबसे बाद में आते हैं, तब तक बेड़ई बनकर तैयार हो जाती हैं। वह आकर सबसे पहले एक दोने में बेड़ई और सब्जी लेकर पहले भट्टी पर भोग लगाते हैं, उसके बाद उसी बेड़ई को गाय को खिलाते हैं। उसके बाद वह अपने पिता चीनी हलवाई की फोटो से पुरानी माला उतारकर नई माला पहनाते हैं और धूप-बत्ती लगाते हैं। स्वर्गवासी पिता को भोग लगाने के बाद ही वह गद्दी पर बैठते हैं।
उन्होंने बताया कि उनके पिता किशनलाल मंगल उर्फ चीनी हलवाई 30 नवंबर 2009 को 63 वर्ष की उम्र में शांत हुए थे। उनके बाबा का नाम शोभाराम मंगल था। वर्ष 1970 में वह ठेला लगाते थे, उसके बाद जब व्यापार बढ़ा और उनकी बेड़ई की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो वर्ष 1984 में उन्होंने मार्केण्डेश्वर मंदिर के पास किराए पर दुकान ली थी। उसके बाद जब पैसा जमा हो गया तो उन्होंने स्टेशन के बगल में यह दुकान 1997 में खरीद ली। पिता के निधन के बाद सुमित मंगल ने दुकान संभाली। उनके छोटे भाई अमित मंगल ने बगल में ही मिठाई की दूसरी दुकान खोल ली।
बेड़ई बनाने की प्रक्रिया
उड़द की छिलका दाल को रात में पानी में भीगने डाल देते हैं। सुबह उसे धोते हैं और उसमें मसाले डाले जाते हैं। मसालों के साथ तेल भी मिलाते हैं। फिर उस दाल को माढ़ा जाता है। इसे पुट्टी कहते हैं। इस पुट्टी को बेड़ई के आटे के बीच में भरते हैं, उसके बाद कढ़ाही में तलते हैं। सबसे खास बात यह है कि इस पुट्टी में हींग का पानी मिलाया जाता है, जो इसके स्वाद को बढ़ा देता है।
यह डाले जाते मसाले
बेड़ई के बीच में भरने वाली पुट्टी में जो मसाले डाले जाते हैं, उनमें लाल पिसी मिर्ची, पिसा धनिया, कसूरी मैथी, हींग का पानी, काला नमक, सफेद नमक और बेसन शामिल हैं।
बेड़ई का माढ़ते आटा
सुमित उर्फ रिंकू मंगल बताते हैं कि बेड़ई के लिए 60 प्रतिशत रवा और 40 प्रतिशत आटा मिलाया जाता है। इससे बेड़ई कुरकुरी हो जाती है। आटे में नमक मिलाया जाता है, फिर इसको विशेष प्रकार से माढ़ा जाता है।
बेड़ई की चटपटी सब्जी बढ़ाती है स्वाद
बेढ़ई के साथ सब्जी का विशेष रोल रहता है। अधिकांश लोग सब्जी के साथ ही बेड़ई खाते हैं। सब्जी बेड़ई का सबसे अहम हिस्सा है। जब दुकान की शुरुआत हुई थी तो बेड़ई 50 पैसे में बेचते थे। अब इसका एक पीस 10 रुपए में मिलता है।
यह डालते सब्जी में
सब्जी में आलू, जीरा, तेज पत्ता, कसूरी मैथी, सुरपुरी, लाल मिर्च पिसी, धनिया पिसा, हल्दी पिसी, खटाई पिसी, गर्म मसाला, हींग का पानी, काला नमक, सफेद नमक, टमाटर, हरा धनिया, मखाने, पनीर, हरी खड़ी मिर्च, दही और सौंफ डालते हैं।
इस प्रकार बनाते सब्जी
सब्जी में पहले तेल डालते हैं। फिर सभी मसालों को एक बड़ी बाल्टी में पेस्ट के रूप में घोल लेते हैं। उसके बाद उसे डालते हैं। जब तेल में मसाले भुन जाते हैं तो आलू डालते हैं। आलू के बाद पानी डालते हैं। आखिरी में टमाटर व हरा धनिया डाला जाता है।
बेड़ई के साथ समोसा-जलेबी खाते हैं लोग
चीनी हलवाई की दुकान पर लोग न केवल बेड़ई खाने आते हैं, बल्कि समोसा व जलेबी भी खाने पहुंचते हैं। सुबह से लेकर रात तक बेड़ई व समोसा खाने वालों की भीड़ लगी रहती है।
अब ग्राहकों की सुनें…
20 सालों से सुबह का नाश्ता इसी दुकान पर
मुरैना के गणेशपुरा निवासी महेश कुशवाह ने बताया कि वे चीनी हलवाई की दुकान पर बेड़ई खाने रोज आते हैं। वे पिछले 20 वर्षों से लगातार बेड़ई खाने आ रहे है। मुरैना में बेड़ई बनाने वाले तो और भी हैं, लेकिन यहां की बेड़ई का स्वाद ही अलग है, इसीलिए वह सुबह-सुबह नाश्ता करने हर रोज यहां ही आते हैं।
6 साल से लगातार यहां की बेड़ई खा रहा
मुरैना निवासी विजय राजपूत ने बताया कि वे पिछले 6 सालों से बेड़ई खाने यहां आ रहे हैं। यहां की बेड़ई का टेस्ट अच्छा है, सबसे खस्ता और कुरकुरी बेड़ई होती है, जो कि अन्य जगह पर नहीं मिलती।
यहां की बेड़ई कुरकुरी और स्वादिष्ट
मुरैना निवासी प्रमोद ने बताया कि वह पिछले 15 सालों से यहां बेड़ई खाने आ रहे हैं। यहां की बेड़ई जितनी कुरकुरी होती है, उतनी ही स्वादिष्ट होती है, यही वजह है कि वे यहां हर दिन बेड़ई खाने आते हैं।
मुरैना जब भी आते, यहां बेड़ई जरूर खाते
अंबाह निवासी सोनू ने बताया कि वे जब भी मुरैना आते हैं तो चीनी हलवाई की बेड़ई जरूर खाते हैं। वहीं पोरसा निवासी विजय सिंह बताते हैं कि वे पहले मुरैना शहर में ही रहते थे। वे बचपन से ही बेड़ई खाने यहां आते रहे हैं। विजय ने कहा कि पिछले 20 वर्षों से इसी दुकान की बेड़ई खाने आता हूं। यहां की बेड़ई का स्वाद इतना अच्छा लगा है कि कहीं और की बेड़ई अब अच्छी ही नहीं लगती है। यहां तक कि वे अपने फैमिली के लिए भी बेड़ई यहां से खरीद कर ले जाते हैं।
मुरैना के लोग जानते तक नहीं थे बेड़ई
सुमित मंगल बताते हैं कि जब 1970 में उनके पिता ने बेड़ई बनाने का काम शुरू किया था, तब मुरैना में कोई बेड़ई जानता तक नहीं था। पहले लोग समोसा ही खाते थे, लेकिन जब उनके पिता स्व. किशनलाल मंगल उर्फ चीनी हलवाई ने ठेले पर बेड़ई बनाना शुरू किया तो लोगों ने समझा कि यह पूड़ी है। बाद में जब उनके मुंह स्वाद लगा तो लोगों की भीड़ जुटने लगी। लोग सुबह-सुबह बेड़ई खाने उनके ठेले पर पहुंचने लगे। खस्ता और करारी होने से लोग इसके दीवाने हो गए।
गांव-गांव तक पहुंची बेड़ई की ख्याति
सुमित मंगल बताते हैं कि पहले बेड़ई खाने वालों में केवल शहर के लोग ही शामिल होते थे, लेकिन देखते ही देखते जिले के आसपास के कस्बों, जिनमें अंबाह, पोरसा, जौरा, कैलारस और सबलगढ़ तक के लोग उनके यहां आकर बेड़ई खाने लगे। जब भी गांवों के लोग मुरैना शहर में बाजार करने आते हैं तो चीनी हलवाई की बेड़ई जरूर खाकर जाते हैं।
अन्य शहरों तक फैली बेड़ई की खुशबू
सुमित मंगल बताते हैं कि जिले के लोगों से होकर उनकी दुकान की प्रसिद्धि आस-पास के जिलों जिनमें ग्वालियर, धौलपुर, भिण्ड और दतिया शामिल हैं, तक जा पहुंची। बाहर के लोग आकर बेड़ई खाने उनके मार्केण्डश्वर मंदिर स्थित वाली दुकान पर पहुंचने लगे थे। सुमित मंगल ने कहा कि यह बात वर्ष 1984 के बाद की है, तब तक उनके पिता ने वहां एक किराए की दुकान ले ली थी।
बाहर के शहरों के लोग जब वहां आने लगे तो लोगों ने कहा कि स्टेशन के पास दुकान होती तो ज्यादा अच्छा होता, क्योंकि स्टेशन पहुंचने की जल्दी में कई लोग दुकान पर नहीं पहुंच पाते थे, लिहाजा उन्होंने स्टेशन के ठीक बगल में एक बड़ी सी दुकान खरीद ली। उसके बाद हाल यह हो गया कि न केवल आसपास के जिलों के बल्कि दूर-दूर के जिलों के लोग भी स्टेशन पर पहुंचकर चीनी हलवाई की दुकान पूछते और बेड़ई खाने उनकी दुकान पर जाने लगे। इसके बाद लोगों की पसंद इतनी बढ़ गई वे बेड़ई को पैक कराकर ले जाने लगे।
50 सालों बाद भी स्वाद बरकरार
सुमित मंगल बताते हैं कि आज उनकी दुकान पर बेड़ई खाने वालों की संख्या जो बरकरार है, उसका कारण यह है कि उनकी बेड़ई का स्वाद जो 50 साल पहले था, वह आज भी है। क्वालिटी से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया, जिससे आज भी लोग उनकी दुकान पर नियमित रूप से आ रहे हैं।
अब, बच्चे बढ़ाएंगे दादा का नाम
सुमित मंगल बताते हैं कि उनकी दो बेटियां है, एक बेटा है। बेटा दुकान में कभी-कभी हाथ बंटाता है। वह चाहते हैं कि उनका बेटा अब उनकी दुकान को संभाले और अपने दादा का नाम आगे ले जाए। उनकी बेटियां बेटे से बड़ी हैं और पढ़ाई कर रही हैं, यह बात अलग है कि सुमित मंगल उर्फ रिंकू 12वीं तक ही पढ़ सके, लेकिन वे अपने बेटे को पढ़ा रहे हैं। इस लायक बनाना चाहते हैं कि वह उनके व्यापार को बहुत आगे तक ले जाए, जिससे उनके पिता का नाम हमेशा के लिए लोगों की जुबान पर कायम रह सके।