केजरीवाल की 'गुगली' और सामने 2024 का चुनाव... आखिर कैसे AAP को लेकर फैसला करेगी कांग्रेस

Updated on 29-05-2023 08:37 PM
नई दिल्ली: कांग्रेस की आज एक महत्वपूर्ण बैठक हुई और इस मीटिंग में यह चर्चा हुई कि आम आदमी पार्टी का साथ अध्यादेश के खिलाफ देना चाहिए या नहीं। हालांकि इस फैसले को सिर्फ अध्यादेश से ही जोड़कर नहीं देखा जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दिल्ली और पंजाब के नेताओं की बैठक बुलाई थी जिसमें केंद्र के अध्यादेश पर चर्चा हुई। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस से भी समर्थन मांगा है कि वह अध्यादेश के खिलाफ संसद में उसका साथ दे। खरगे की पहली बैठक पंजाब के नेताओं के साथ हुई और उसके बाद दिल्ली के नेताओं के साथ बैठक हुई। कांग्रेस के लिए आम आदमी पार्टी को लेकर फैसला करना आसान नहीं होगा। वहीं इस पूरे मुद्दे पर कांग्रेस के लिए एक अजीब सी स्थिति पैदा हो गई है। एक ओर दिल्ली और पंजाब के नेता हैं जो AAP के खिलाफ खड़े हैं तो वहीं दूसरी ओर 2024 से पहले विपक्षी एकता की धुरी बनने का सवाल है।
फैसला मुश्किल न होता यदि सामने 2024 लोकसभा चुनाव न होता
केजरीवाल की अपील पर फैसला करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। कांग्रेस आलाकमान की ओर से पहले ही कहा गया था कि वह स्टेट यूनिट से बात करने के बाद ही कोई फैसला करेगी। इसी कड़ी में सोमवार को बैठक हुई। हालांकि इस बैठक से पहले ही दिल्ली और पंजाब कांग्रेस के नेता खुलकर आम आदमी पार्टी का विरोध कर रहे थे। इनकी ओर से कहा जा रहा है कि AAP का साथ नहीं देना चाहिए। यह पार्टी के हित में बिल्कुल भी नहीं होगा। हालांकि अब फैसला आलाकमान को करना है। सूत्रों का कहना है कि आज की बैठक में भी नेताओं ने विरोध जताया है। कांग्रेस पार्टी इसका फैसला कर भी लेती यदि बात सिर्फ अध्यादेश की होती और सामने 2024 का चुनाव नहीं होता। इस अध्यादेश पर कांग्रेस के स्टैंड का असर अगले लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता पर पड़ना तय है। 2024 विपक्षी एकता की धुरी बनना कांग्रेस के लिए जरूरी है। उसकी अपील पर कई दल साथ आए हैं। केजरीवाल की अपील पर दूसरे विपक्षी दल जिनमें ममता, नीतीश, केसीआर प्रमुख वह उनके साथ आए हैं। दूसरे दलों के ऐलान के बाद कांग्रेस के ऊपर भी प्रेशर है लेकिन दूसरे दलों की तरह उसके लिए फैसला करना आसान नहीं।
आम आदमी पार्टी से कांग्रेस को कितना फायदा
यदि कांग्रेस आम आदमी पार्टी का साथ देती है तो क्या इसका फायदा उसे मिलेगा। क्या आगे चलकर दोनों दलों के बीच गठबंधन होगा, यदि होता है तो क्या आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस के लिए सीटें छोड़ेगी। दिल्ली और पंजाब इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। ऐसे में क्या गठबंधन से पुराने जनाधार को वापस पा सकते हैं। दिल्ली के कई कांग्रेस नेताओं ने इस मुद्दे पर केजरीवाल का समर्थन करने का खुलकर विरोध किया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन और पूर्व सांसद संदीप दीक्षित काफी मुखर रहे हैं कि कांग्रेस को आप का समर्थन नहीं करना चाहिए। माकन ने अपने रुख के लिए कई प्रशासनिक, राजनीतिक और कानूनी कारणों का भी हवाला दिया है। केजरीवाल कुछ समय पहले तक कांग्रेस पर भी काफी हमलावर रहे हैं लेकिन हाल के दिनों में केजरीवाल और उनकी पार्टी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इस बात को कांग्रेस भी समझ रही है। फिलहाल आम आदमी पार्टी केवल इस अध्यादेश की बात कर रही है।

बीजेपी के बाद कांग्रेस के लिए चुनौती कौन
कांग्रेस के लिए क्या सिर्फ बीजेपी ही चुनौती है। पूर्व में कई मौकों पर आम आदमी पार्टी की ओर से कहा गया है कि वह देश में बीजेपी का विकल्प है। हाल ही में पार्टी को राष्ट्रीय दल का भी दर्जा मिल गया है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस को जितना बीजेपी से खतरा है उतना ही उसे आम आदमी पार्टी से भी है। केजरीवाल और राहुल गांधी के बीच कौन बेहतर इसको लेकर सर्वे भी सामने आते रहते हैं। कांग्रेस ने पहले कई मौकों पर आम आदमी पार्टी से एक दूरी बनाकर रखी है। कई मुद्दों पर कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी का खुलकर विरोध भी किया है। अब ऐसे वक्त में क्या सिर्फ विपक्षी एकता की धुरी बनने के लिए कांग्रेस कोई नुकसान उठाएगी। इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह भी तय है कि कांग्रेस किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले अच्छी तरह से गुणा-गणित करेगी कि उसे इसका कितना फायदा और केजरीवाल की पार्टी को कितना। इस पूरे मामले में वह आखिर तक इंतजार भी कर सकती है।

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