मालवा- निमाड़ के आदिवासी क्षेत्रों में नए नेतृत्व की कमी से जूझ रही भाजपा

Updated on 03-09-2023 05:03 PM

 इंदौर। मध्य प्रदेश के चुनावी समर में 66 विधानसभा सीटों वाले मालवा-निमाड़ क्षेत्र पर प्रदेश और केंद्रीय स्तर के भाजपा नेताओं की निगाहें जमी हैं। यही वह क्षेत्र है जिसने 2018 के चुनाव में भाजपा से सत्ता का सिंहासन छीनने का काम किया था। इसमें भी उन 22 विधानसभा क्षेत्रों का योगदान अधिक था जो आदिवासी मतदाता बहुल हैं।

हार को भूली नहीं भाजपा

क्षेत्र से बाहर प्रभाव नहीं बना सके

आदिवासी विधायकों और मंत्रियों को आगे किया, लेकिन वे अपने क्षेत्र से बाहर प्रभाव नहीं बना सके। नए नेतृत्व को उभारने की कोशिशें भी हुई लेकिन वे भी उतनी कारगर साबित नहीं हो सकी जितनी भाजपा को उम्मीद थी। अब चुनाव सामने हैं और पांचवीं बार सरकार बनाने के लिए भाजपा धरती-आसमान एक कर रही है लेकिन आदिवासी वोटों की नाव का खेवनहार भाजपा के पास नहीं है।

2003 में भाजपा ने कांग्रेस से छीना था यह गढ़

मालवा-निमाड़ में धार, झाबुआ, आलीराजपुर, बड़वानी, खरगोन और बुरहानपुर जिलों में आदिवासी मतदाताओं की संख्या अधिक है। 2003 के पहले तक यह क्षेत्र कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता था।

भाजपा सर्वमान्य नेतृत्व तैयार नहीं कर पाई

संघ और अन्य सहयोगी संगठनों ने इस क्षेत्र में धीरे-धीरे राह तैयार की जिससे गुजरकर भाजपा ने 2003 के विधानसभा चुनाव में मालवा-निमाड़ में 51 सीटें जीत ली। इसमें आदिवासी क्षेत्रों की वे सीटें भी शामिल थीं जहां चार-पांच दशक से कांग्रेस के अतिरिक्त कोई अन्य दल का उम्मीदवार जीत नहीं पाया था। इसके बाद भाजपा ने 15 वर्ष तक इस क्षेत्र में अपना दबदबा कायम रखा और लगातार जीत भी हासिल की लेकिन इस समयावधि में पार्टी यहां सर्वमान्य नेतृत्व तैयार नहीं कर पाई।

सबको साधने वाले नेतृत्व का अभाव

कांग्रेस जब तक आदिवासी बहुल सीटों पर काबिज रही तब उसके पास दो बार उपमुख्यमंत्री रहीं जमुना देवी, शिवभानु सिंह सोलंकी, कांतिलाल भूरिया जैसे प्रदेश स्तर के नेता रहे हैं। जबकि भाजपा के पास दिलीप सिंह भूरिया के बाद उनके कद का कोई नेता नहीं रहा जो मालवा-निमाड़ क्षेत्र के आदिवासियों को नेतृत्व दे सके।

दिलीप सिंह भूरिया ने अपने कार्यकाल के दौरान सिर्फ क्षेत्र की राजनीति नहीं की बल्कि वे जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दों पर सकल आदिवासी समाज की सोच के साथ आगे बढ़े थे। भाजपा में नागर सिंह चौहान, निर्मला भूरिया, रंजना बघेल जैसे आदिवासी नेता हैं लेकिन इनका प्रभाव क्षेत्र अधिक विस्तृत नहीं होने की वजह से भाजपा को लाभ नहीं मिल पा रहा है।

मंत्रिमंडल में भी प्रेम सिंह पटेल, विजय शाह जैसे मंत्री शामिल हैं लेकिन नेतृत्व संकट बरकरार है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित अन्य संगठन पदाधिकारी भी आदिवासी बहुल जिलों में लगातार पहुंच रहे हैं लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में नेतृत्व की कमी से भाजपा कैसे पार पाएगी यह आने वाला समय ही बताएगा।



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