ईरान युद्ध पर अपने ही घर में बुरी तरह घिरे ट्रंप, टूट रहा सपना, कहीं एक और इराक न बन जाए ईरान

Updated on 19-03-2026 12:52 PM
न्यूयॉर्क : अमेरिका में युद्ध कभी सिर्फ विदेश नीति नहीं होता, यह हमेशा घरेलू राजनीति में बदल जाता है। ईरान पर हमला करने से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी नहीं ली और यही अब विवाद का केंद्र बन रहा है। विपक्ष का आरोप है कि राष्ट्रपति ने देश को बिना स्पष्ट जनमत के एक नए संघर्ष में झोंक दिया। दिलचस्प बात यह है कि सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं उठा रहा, ट्रंप के अपने समर्थक भी असहज हैं।

अमेरिका में बढ़ता असंतोष

'अमेरिका फर्स्ट' की राजनीति का मूल वादा था विदेशी युद्धों से दूरी। लेकिन, अब नोबेल शांति पुरस्कार के लिए स्वीडन को बुली करने वाले राष्ट्रपति ने अमेरिका को ऐसे संघर्ष में धकेल दिया है, जिसमें हर रोज लगभग एक बिलियन डॉलर स्वाहा हो रहे हैं। वहीं, अमेरिका के भीतर महंगाई ने आम आदमी का जीवन संघर्षमय बना दिया है। यहीं से ट्रंप की असली कश्मकश शुरू होती है - बाहर युद्ध, अंदर असंतोष।

ईरान बनेगा एक और इराक?

ट्रंप का सबसे मजबूत किला है उनका 'MAGA' यानी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन बेस। उनके समर्थकों ने उन्हें इसलिए चुना था, क्योंकि वह वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसे 'अंतहीन युद्धों' के खिलाफ थे। लेकिन, जब तेहरान के सैन्य अड्डों और अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत टॉप लीडरशिप के सफाए की खबरें आ रही हैं, तो उत्साह से ज्यादा डर हावी है। लोगों के बीच सवाल है कि क्या ईरान एक और 'इराक' बनने जा रहा है?

इजरायल का युद्ध

मिड-टर्म इलेक्शन सिर पर है और रिपब्लिकन रणनीतिकार डरे हुए हैं कि कहीं युद्ध का दांव उल्टा न पड़ जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिकी मतदाता जीत से ज्यादा अपनी जेब की फिक्र कर रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह युद्ध तो इजरायल का है, जिसे अमेरिका लड़ रहा है।

घटती लोकप्रियता

अमेरिका में पेट्रोल-गैस की कीमतें बढ़ रही हैं। कच्चे तेल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुका है। ट्रंप की लोकप्रियता सेंसेक्स की तरह हर दिन गिरती चली जा रही है। मिड-टर्म इलेक्शन से ठीक पहले महंगाई का बढ़ना किसी भी राष्ट्रपति के लिए 'पॉलिटिकल स्यूसाइड' जैसा है।

मंदी का खतरा

वॉल स्ट्रीट की 'कंपकंपी' जनमानस में प्रतिध्वनित होती दिखती है। निवेशकों को डर है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ेंगी। इससे मंदी का खतरा बढ़ जाएगा। क्या यह युद्ध वास्तव में 34 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी कर्ज को मैनेज करने की चाल है, या यह खुद अमेरिका को कर्ज के और गहरे गड्ढे में गिरा देगा?

टूट रहा सपना

ट्रंप का दावा था कि वह ईरान को कट्टरपंथी मुल्लाओं से मुक्त करा देंगे। अमेरिका ने बड़ी आसानी से बदलाव लाने के सपने के साथ आक्रमण किया था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कह रही है। टॉप लीडरशिप के सफाए के बावजूद, ईरान का प्रशासनिक ढांचा और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के बचे हुए हिस्से अब भी प्रतिरोध कर रहे हैं।

खुद ही उलझे

इस्लामिक रिपब्लिक की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें केवल बमबारी से उखाड़ना नामुमकिन लग रहा है। होर्मुज स्ट्रेट में तेल की आवाजाही अब भी बाधित है, और ट्रंप का 'फ्री फ्लो ऑफ ऑयल' का वादा फिलहाल अधूरा सपना नजर आता है। और जब वह बिना शर्त सरेंडर करने की बात करते हैं, तो सवाल उठता है कि कौन सरेंडर करेगा? ऐसा लगता है कि ट्रंप अपने बनाए चक्रव्यूह में खुद उलझ गए हैं।

पुरानी गलती

अमेरिका ने 1953 में शाह को गद्दी पर बैठाने के लिए जो तख्तापलट किया था, उसने 1979 की कट्टरपंथी क्रांति को जन्म दिया। आज 2026 में, इतिहास खुद को दोहराने की कोशिश कर रहा है। क्या ईरान की जनता को ट्रंप वह 'आधुनिकता' और 'स्वतंत्रता' दे पाएंगे, जिसका वादा उन्होंने विद्रोहियों से किया था, या वह केवल एक और 'इराक' या 'अफगानिस्तान' बना रहे हैं?

दुनिया पर संकट

ट्रंप की लोकप्रियता आज दांव पर है। अगर वह जल्द ही तेल का प्रवाह बहाल नहीं कर पाए और शांति की मेज पर नहीं लौटे, तो 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' उनकी ऐतिहासिक गलती साबित हो सकता है। परेशानी यह है कि ट्रंप के फैसलों की वजह से भारत जैसे देशों के सामने भी संकट खड़ा हो गया है, जो केवल कूटनीतिक नहीं, आर्थिक भी है। तेल की बढ़ती कीमतें भारत की प्रगति की रफ्तार रोक सकती हैं। और रही ईरान की बात, तो वहां के लोग आज भी उसी अंधेरे में हैं - विदेशी बम गिर रहे हैं और भविष्य की कोई गारंटी नहीं है।

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