
मप्र पीएससी और ईएसबी ने भले ही लगभग 9000 पदों के परिणाम रोके हैं, पर इसका असर उन लाखों युवाओं के भविष्य पर है जो चयन के अंतिम पड़ाव पर थे। उदाहरण के तौर पर जिन परीक्षाओं में साक्षात्कार भी हैं उनमें तीन गुना अधिक अभ्यर्थियों को इसमें शामिल किया जाता है। ऐसे में जितने पद होल्ड हैं उसका तीन गुना अधिक अभ्यर्थी चयन की आस लगाए हैं।
अनारक्षित और ओबीसी दोनों वर्ग को शामिल करें तो यह संख्या दोगुनी हो जाती है। परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा में हजारों युवा ओवरएज हो गए। पुलिस आरक्षक, शिक्षक भर्ती सहित कई परीक्षाओं में साक्षात्कार की जगह सिर्फ लिखित परीक्षा होती है। इस लिखित परीक्षा दो से सात लाख तक युवा बैठते हैं जो परिणाम की प्रतीक्षा से परेशान हैं। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं का भविष्य भी निर्णय से प्रभावित होगा।
ओबीसी आरक्षण प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। कांग्रेस की तत्कालीन कमल नाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। मार्च 2020 में भाजपा सरकार आने पर कांग्रेस हमेशा सरकार पर ओबीसी को 27 आरक्षण देने के प्रति गंभीर नहीं होने की बात कहती रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार कह चुके हैं सरकार की कथनी-करनी में फर्क है। उधर, सरकार की तरफ से मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव खुद कह चुके हैं कि सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी।