सुप्रीम कोर्ट बोला-राज्यपाल विधानसभा से पास बिलों को न लटकाएं:बिल मंजूर करें, लौटाएं या राष्ट्रपति को भेजें

Updated on 20-11-2025 12:32 PM

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति और राज्यपाल की बिल मंजूरी की डेडलाइन तय करने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि हमें नहीं लगता कि गवर्नरों के पास विधानसभाओं से पास बिलों (विधेयकों) पर रोक लगाने की पूरी पावर है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'गवर्नर्स के पास 3 ऑप्शन हैं। या तो मंजूरी दें या बिलों को दोबारा विचार के लिए भेजें या उन्हें प्रेसिडेंट के पास भेजें।' सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिलों की मंजूरी के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। अगर देरी होगी तो हम दखल दे सकते हैं।

यह मामला तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच हुए विवाद से उठा था। जहां गवर्नर ने राज्य सरकार के बिल रोककर रखे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को आदेश दिया कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है।

इसी फैसले में कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सामने आया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने मामले में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और 14 सवाल पूछे थे। इस मामले में 8 महीने से सुनवाई चल रही है।

कोर्ट रूम LIVE, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- समयसीमा तय नहीं की जा सकती

  • सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को स्वीकृति देने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। न्यायपालिका भी ऐसे मामलों में अनुमानित स्वीकृति (डीम्ड असेंट) नहीं दे सकती। डीम्ड असेंट को आसान भाषा में कहा जाए तो अगर राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास कोई बिल मंजूरी के लिए गया है, और वे समय पर जवाब नहीं देते, तो कानून यह मान लेता है कि मंजूरी दे दी गई है। यानी, बिना बोले भी हां मान ली जाती है।
  • गवर्नर के पास 3 संवैधानिक विकल्प हैं- मंजूरी, राष्ट्रपति के लिए रिजर्व, बिल को रोकना और असेंबली को वापस करना। गवर्नर 3 विकल्पों का इस्तेमाल करते समय अपनी समझ का इस्तेमाल करते हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल की शक्तियां विवेकाधीन हैं। किसी विधेयक पर फैसला लेते समय राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे नहीं हैं।
  • कोर्ट मेरिट में नहीं जा सकता, लेकिन लंबे समय तक, बिना किसी वजह के, या अनिश्चित देरी होने पर, कोर्ट सीमित निर्देश जारी कर सकता है। राष्ट्रपति के साथ भी ऐसा ही है। न्यायिक समीक्षा पर पूरी तरह रोक है, लेकिन लंबे समय तक कार्रवाई न करने की स्थिति में, संवैधानिक कोर्ट अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल कर सकता है।
  • बेंच ने कहा- गवर्नर या राष्ट्रपति के लिए न्यायिक रूप से समय सीमा तय करना सही नहीं है। राज्यपाल की मंजूरी को कोर्ट नहीं बदल सकता। राज्यपाल विधेयक को कानून बनाने के बीच सिर्फ एक रबर स्टैंप नहीं हैं।

CJI की अगुआई में 5 जजों की बेंच ने सुनवाई की

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की जगह इस मामले में चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली संविधान पीठ ने सुनवाई की। पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और एएस चंद्रचूड़कर शामिल थे। सुनवाई 19 अगस्त से शुरू हुई थी।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा। वहीं, विपक्ष शासित राज्य तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश ने केंद्र का विरोध किया।

10 सितंबरः सॉलिसिटर जनरल बोले- 1970 से अब तक सिर्फ 20 बिल ही लंबित

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, 1970 से अब तक सिर्फ 20 बिल ही राष्ट्रपति के पास लंबित रहे, जबकि 90% बिल एक महीने में पास हो जाते हैं। इस पर सीजेआई ने आपत्ति जताते हुए कहा कि केवल आंकड़ों से निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। अगर राज्यों के दिए आंकड़े नहीं माने गए तो आपके भी नहीं माने जाएंगे।



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