रुपये का बढ़ रहा है रुतबा लेकिन क्या डॉलर का राज कभी खत्म हो सकेगा?

Updated on 03-04-2023 06:00 PM
नई दिल्ली: अमेरिकी डॉलर ने लगभग आठ दशकों तक दुनिया की इकॉनमी पर राज किया है। इसे दुनिया के सबसे सुरक्षित असेट्स में से एक माना जाता है। आपसी कारोबार के लिए विश्व इस करंसी पर निर्भर रहा है, लेकिन अब कई देश डॉलर से दूरी बनाना चाहते हैं। इस कारण डॉलर का भविष्य में कितना प्रभुत्व रहेगा, इस पर सवाल उठ रहे हैं। 2022 में रूस ने यूक्रेन पर ज्यों ही हमला किया, उसके खिलाफ अमेरिका की अगुआई में कई वित्तीय प्रतिबंध लाद दिए गए। पश्चिमी सरकारों ने रूस के विदेशी मुद्रा भंडार के करीब आधे को फ्रीज करने का फैसला किया। इसके साथ ही प्रमुख रूसी बैंकों को SWIFT से हटाने का निर्णय लिया गया, जो सीमा पार इंटरनैशनल पेमेंट की सुविधा है। चीन का पहले से ही अमेरिका से तनाव चल रहा है। उसे लगा कि अमेरिका यही हथियार आगे चलकर चीन के साथ भी चल सकता है। खतरा देख रूस और चीन अपना वित्तीय ढांचा तैयार करने में जुट गए।


चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी है, जबकि रूस दुनिया का सबसे बड़ा एनर्जी एक्सपोर्टर है। रूस के पुतिन और चीन के चिनफिंग के बीच हाल में मुलाकात के बाद ये खबर आई है कि रूस तेल के लिए युआन लेने के पक्ष में हैं। ये भी खबर आई कि सऊदी अरब कच्चे तेल के बदले में चीन से युआन में भुगतान लेने को तैयार है। ये डॉलर के लिए गहरी चोट हो सकती है। भारत ने भी रूस को कच्चे तेल का भुगतान करने के लिए डॉलर की जगह दूसरी मुद्राओं को चुना। रूस पर पाबंदियों का असर दुनिया के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ा था। बाकी देश भी डॉलर का विकल्प सोचने लगे। इसमें अमेरिका के करीबी दोस्त भी शामिल हो रहे हैं।

क्या है वजह


अमेरिका ने हाल ही में अपने यहां महंगाई को देखते हुए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की, जिससे डॉलर दूसरी मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हो गया। अब दूसरे देशों के पास यही उपाय था कि वे अमेरिका की तरह ब्याज दरें बढ़ाएं और ग्रोथ से समझौता करें। भारत ने यही किया। अगर नहीं करते तो करंसी को कमजोर होता हुआ देखने की मजबूरी थी। जापान के साथ यही हुआ। दुनिया का अधिकांश कारोबार डॉलर में होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 44 देशों के प्रतिनिधि 1944 में दुनिया की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए मिले। इस बात पर सहमति हुई कि सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका डॉलर के मूल्य को सोने के मुकाबले तय करेगा, जबकि अन्य देश अपनी मुद्राओं को डॉलर के मुकाबले तय करेंगे।

देशों को अब एक्सचेंज रेट को बनाए रखने के लिए रिजर्व में डॉलर रखना पड़ा, जिससे यह प्रमुख ग्लोबल मुद्रा बन गई। सत्तर के दशक तक यह व्यवस्था बिखरने लगी, क्योंकि अमेरिका के पास डॉलर के सपोर्ट के लिए पर्याप्त सोना नहीं था। लेकिन तब तक दूसरे देशों में डॉलर की गहरे तक पैठ हो गई थी। नतीजतन उसकी शान कम न हो सकी। इसकी वजह ये भी है कि अमेरिका में कॉरपोरेट गवर्नेंस दूसरे देशों की तुलना में बेहतर माना जाता है। डॉलर की शान खत्म करने के प्रयास बाद में भी हुए। यूरोपीय संघ ने 1999 में यूरो लॉन्च किया। फिर 2008-2009 का वित्तीय संकट आया। डॉलर सब झेल गया।

ब्रिक्स की जिम्मेदारी

आज, दुनिया के केंद्रीय बैंकों के पास जो विदेशी मुद्रा भंडार है, उसका करीब 60 प्रतिशत डॉलर में ही है। हालांकि करीब 20 साल पहले यह मात्रा 70 पर्सेंट थी। यानी बदलाव तो आ रहा है, लेकिन धीरे-धीरे। चीन की करंसी युआन का हिस्सा तीन फीसदी ही है, लेकिन यह सबसे तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन चीन पर यकीन का बड़ा मुद्दा है। खुद भारत के लिए यह दिक्कत की बात होगी। अमेरिका की वित्त मंत्री जैनेट येलेन का मानना है कि डॉलर को कोई चुनौती नहीं है। जानकार भी मानते हैं कि कोई अन्य मुद्रा निकट भविष्य में डॉलर का प्रभुत्व बदलने की स्थिति में नहीं है। लेकिन ये हो सकता है कि डॉलर के साथ कोई एक और मुद्रा भी धीरे-धीरे उभरे। गोल्डमैन सैक्स ग्रुप के पूर्व चीफ इकॉनमिस्ट जिम ओ नील का कहना है कि ब्रिक्स देशों (ब्राजील, चीन, भारत, साउथ अफ्रीका) को इस पर पहलकदमी करनी चाहिए।

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