शूटआउट पर तालियों की गूंज बड़ी बीमारी का कर रही है इशारा, क्या कोर्ट-पुलिस को सुधार पाएगी मोदी सरकार?

Updated on 21-04-2023 06:25 PM
नई दिल्‍ली: अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की पुलिस कस्‍टडी में हत्‍या ( Atiq Ahmed Murder) के बाद दो पक्ष सामने आए हैं। एक पक्ष इस बात से खुश है कि ऐसे निर्मम अपराधी के साथ जो कुछ हुआ बिल्‍कुल ठीक है। वहीं, दूसरा पक्ष भी है। इसे लगता है कि जिस तरह से सुरक्षा घेरे में अतीक की कनपटी पर हमलावरों ने गोली मारकर उसे ढेर कर दिया, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए गलत है। पूर्व डिप्‍लोमैट और लेखक पवन के वर्मा ने न्‍यूज वेबसाइट फर्स्‍टपोस्‍ट में इसे लेकर अपनी राय जाहिर की है। उन्‍होंने एक लेख में कहा है कि यह मामला पुलिस, राजनीति और न्‍यायायिक सुधारों की गंभीर जरूरत की ओर इशारा करता है। लेख में उन्‍होंने बताया है कि इस तरह के एनकाउंटरों के क्‍या नुकसान हैं? क्‍यों यह एक बड़ी चिंता को पैदा करता है?
लेख की भूमिका में ही पवन इस बात को साफ करते हैं कि यह कोई पॉलिटिकल कॉलम नहीं है। न ही इसका तुष्टिकरण से लेनादेना है। यह लेख उचित प्रक्रिया के बारे में है जिसका संविधान में जिक्र है। यह एनकाउंटर राज को महिमामंडित करने के घातक परिणामों के बारे में है। यह राजनीति और अपराधियों के बीच खतरनाक गठजोड़ के बारे में है। यह सुस्त न्यायिक प्रक्रिया की निराशाजनक स्थिति के बारे में है। यह पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों की अपने राजनीतिक आकाओं के प्रति बढ़ती दासता के बारे में है।
क‍िसने बनाया माफ‍िया को नेता?
पूर्व डिप्‍लोमैट अपने लेख में कहते हैं कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अतीक अहमद एक अपराधी था। उसके खिलाफ 100 से ज्‍यादा मामले दर्ज थे। लेकिन, यह पूछना भी लाजिमी है कि वह इतने लंबे समय तक कानून से कैसे बचा रहा? वे कौन सी ताकतें थीं जिन्होंने उसके आपराधिक कृत्यों का पालन-पोषण, समर्थन और यहां तक कि उसकी रक्षा की? समाजवादी पार्टी (सपा) और अपना दल पार्टी के पास इस सवाल का जवाब देने के लिए बहुत कुछ है। सपा ने उसे 2004 में लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया था। अपना दल ने माफिया को 2002 में विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया था। दोनों पार्टियों ने जानते-बूझते हुए ऐसा किया था। वे माफिया डॉन की साख के बारे में बड़ी अच्‍छी तरह जानते थे। लेकिन, टिकट देने का सिर्फ एक मकसद यह था कि अतीक उनकी पार्टियों के लिए वोट ला सकता था। वह निर्दलीय के रूप में भी लड़ा। लेकिन, तब भी उसे कुछ राजनीतिक दलों का गुप्त समर्थन मिला।

पवन के अनुसार, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अतीक मुसलमान था। जितने बाहुबली हिंदू हैं या दूसरे धर्म के हैं, उन पर भी जघन्य अपराधों के दर्जनों मामले दर्ज हैं। अपराधी अपराधी होता है और कानून की नजर में उसकी कोई जाति या पंथ नहीं होता है। अतीक ने सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी। उसे लगा था कि गिरफ्तारी के बाद उसकी जान को खतरा था।

लेख में पवन सवाल उठाते हुए कहते हैं कि क्या अपराध और राजनीति के गठजोड़ से फायदा उठाने के लिए सिर्फ सपा और अपना दल ही दोषी हैं? लेखक के मुताबिक, देशभर के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो पाएंगे कि शायद ही कोई दल अपने नाम के अनुरूप है। संसद के आंकड़ों को लें तो मिलेगा कि पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ आपराधिक मामलों का सामना कर रहे माननीयों की भरमार है। इन पर डकैती से लेकर हत्या तक के केस हैं।

क्‍यों आम लोगों का अच्‍छा लगता है एनकाउंटर?
वह लिखते हैं कि आम नागरिक एनकाउंटर की अक्सर सराहना करते हैं। दरअसल, ये एनकाउंटर अपराध के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' का मैसेज देते हुए मालूम पड़ते हैं। इनसे एक मजबूत सरकार की छवि दिखती है जो कम साधनों के बावजूद अंतिम लक्ष्य का पीछा करने के लिए संकल्पित है। इसकी एक वजह है। देश का न्यायशास्त्र इस सिद्धांत पर आधारित है कि एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चााहिए। फिर भले नौ अपराधी छूट जाए। इसमें स्वाभाविक रूप से अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए अदालतों के समक्ष स्थायी सबूत पेश करने की जरूरत पड़ती है। यह प्रक्रिया प्रभाव वाले अपराधियों को बचने का मौका दे देती है। इसमें वकीलों की भूमिका आती है। गवाहों को धमकाना-लुभाना आता है। कानून के भीतर खामियों का फायदा उठाने की चालें आती हैं। दोष साबित होने में सालों साल लग जाते हैं। इस दौरान अपराधी या तो जमानत लेकर बाहर होता है या फिर जेल के अंदर अपनी गतिविधियों को चलाता है। यहां तक कि राज्य विधानसभा या संसद के लिए निर्वाचित भी हो जाता है। यही कारण है कि आम आदमी को लगता है कि एनकाउंटर में हत्‍या अपराध से निपटने का ज्यादा तेज और ज्यादा प्रभावी तरीका है। इसमें ताज्‍जुब भी नहीं होना चाहिए।

ऐसे न्‍याय में क‍िस तरह की समस्‍या?
लेखक कहते हैं कि इस तरह के न्याय में हालांकि एक गंभीर समस्या है। अगर एनकाउंटर किलिंग और फटाटफ न्याय को वैधता मिल जाती है तो राज्य को बेगुनाहों या विरोधियों के खिलाफ बदला लेने से क्या चीज रोकेगी? जो लोग इस तरह की कार्रवाई की सराहना कर रहे हैं जब कानून की उचित प्रक्रिया का सहारा लिए बिना उनके खिलाफ ऐक्‍शन होगा तो उन्हें पछतावा होगा। कथित रूप से दोषी के खिलाफ 'बुलडोजर' जस्टिस इस ज्‍यादती का एक और उदाहरण है। 1970 के दशक में आपातकाल के दौरान शुरुआत में मध्यम वर्ग इसका सबसे बड़ा समर्थक था। लेकिन, जल्द ही यह एहसास हो गया कि जब अपराध और सजा के बीच कानून का राज खत्म हो जाता है तो कोई भी सुरक्षित नहीं है।

पवन कहते हैं कि पुलिस व्यवस्था को एक गंभीर बदलाव की जरूरत है। जिस सहजता से वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी अपने राजनीतिक आकाओं के दास बन जाते हैं और निष्पक्ष रूप से कानून को बनाए रखने के अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं, उसने खतरनाक रूप धारण कर लिया है। भले ही कोई भी सरकार सत्ता में हो। लंबे समय से प्रतीक्षित पुलिस सुधार को तत्काल लागू करने की आवश्यकता है। उन्‍हें खुशी है कि अतीक की हत्या की न्यायिक जांच शुरू हो गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भी जारी किया है। उम्‍मीद करनी चाहिए कि जांच निष्पक्ष और विश्वसनीय होगी। ऐसा नहीं होने पर नतीजे अशुभ होंगे।

अन्य महत्वपुर्ण खबरें

 20 September 2026
नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव में ABVP की शानदार जीत के बाद देश का सियासी पारा भी चढ़ गया है। बीजेपी और एबीवीपी के नेताओं ने कांग्रेस और…
 20 September 2026
सुभद्रा श्रीवास्तव, नई दिल्ली: देश के 180 से अधिक वैज्ञानिकों और इको लॉजिकल एक्सपर्ट ने सुपर अल नीनो को लेकर अलर्ट जारी किया है। उन्होंने रिसर्चर्स और इस क्षेत्र में…
 20 September 2026
गणेश उत्सव आते ही घर-घर में वे कथाएं फिर दोहराई जाने लगती हैं जो बचपन से सुनी हैं। एक बालक है, जिसे माता पार्वती ने द्वार पर बिठाया है। शिवजी…
 20 September 2026
नई दिल्ली: इंदौर में राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी की नकल करने और उनके अंग्रेजी बोलने के अंदाज का मजाक उड़ाने पर सियासी बयानबाजी…
 20 September 2026
नई दिल्ली: 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में अल-कायदा के हमले ने करीब 3,000 लोगों की जान ले ली थी। उस भयावह हमले के बाद शायद ही किसी ने सोचा…
 20 September 2026
दीपांजन रॉय चौधरी, नई दिल्ली: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के भारत दौरे को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। माना जा रहा कि इस साल के आखिर तक बालेन…
 20 September 2026
नई दिल्ली: देश की जानी-मानी वरिष्ठ पत्रकार पायल मेहता का मुंबई में निधन हो गया। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दुख जताया है।…
 20 September 2026
नई दिल्ली: पर्यावरण और पारिस्थितिकी की सुरक्षा में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका का जिक्र करते हुए CJI सूर्यकांत ने शनिवार को शीर्ष अदालत को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद का पेड़’…
 19 September 2026
भास्कर रिपोर्टर प्रमोद साहू ने साइबर क्राइम एक्सपर्ट मुकेश चौधरी के साथ बातचीत की। इस दौरान एक्सपर्ट ने कहा कि बच्चों के हाथ में फोन और उसमें ऑनलाइन गेम अब…
Advt.