इजरायल की शिक्षा प्रणाली में अति रूढ़िवादियों का दबदबा:अब धार्मिक स्कूल हावी, सरकारी फंडिंग भी

Updated on 06-12-2022 06:05 PM

साइंस-टेक्नोलॉजी के बूते दुनिया में अपना डंका बजाने वाले इजरायल में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। एक ओर बाइबिल यानी धार्मिक शिक्षा देने वाले स्कूलों की संख्या बढ़ाई जा रही है, जबकि दूसरी ओर गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों को उपेक्षित किया जा रहा है। यहां प्राइमरी स्कूलों में धार्मिक विषयों को अनिवार्य कर उन्हें सरकारी फंड दिया जा रहा है।

इस बदलाव का कारण शिक्षा व्यवस्था में रूढ़िवादी सोच के लोगों का दबदबा माना जा रहा है। इसके चलते प्राथमिक स्कूलों में ट्रेनी टीचर्स की संख्या भी 38% घट गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यही हालात रहे तो ज्ञान-विज्ञान की दौड़ में इजरायल के लोग दुनिया में पिछड़ जाएंगे।

इजरायल के टीचर्स कॉलेज फोरम के प्रमुख हैम शेक कहते हैं- ‘हमारी शिक्षा को लेकर दो मिथक हैं। पहला- यहूदी शिक्षा को बेहद गंभीरता से लेते हैं। जब हम निर्वासन की हालत में थे, तब हमें यहूदी पहचान को बनाए रखने की जरूरत थी। पर अब ऐसा नहीं है। दूसरा- इजराइल अब तकनीकी रूप से बेहद सफल देश और कई स्टार्टअप्स के साथ दुनियाभर में अपनी पहचान बनाए हुए है।

हमारी शिक्षा भी आला दर्जे की है, लेकिन हमारे इर्दगिर्द शिक्षा प्रणाली की असफलता हमें घेरे हुए है। इजरायली शिक्षा मंत्रालय की महानिदेशक डेलिट स्टॉबर कहती हैं- ‘हमारे यहां 10% से ज्यादा कर्मचारी टेक्नाेलॉजी से जुड़ी इंडस्ट्रीज में हैं। यह संख्या दुनियाभर में सबसे ज्यादा है, लेकिन हमारे बच्चे वैश्विक मंच पर फिसड्‌डी साबित हो रहे हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली एक गंभीर रणनीतिक संकट झेल रही है।

प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीसा) की स्कोरिंग में 15 साल तक के हमारे बच्चे रैंकिंग में लगातार पिछड़ रहे हैं। 2018 तक 37 देशों के मूल्यांकन में हमारा 29वां स्थान था। यही नहीं, गणित में और नीचे 32वां और विज्ञान में 33वां नंबर था। यह रैंकिंग हमारे लिए बेहद चिंता पैदा करने वाली है।

साल 2020 में हर पांचवें बच्चे ने अति रूढ़िवादी प्रणाली में प्राइमरी स्कूल में दाखिला लिया है। स्वाभाविक है कि ये अनुपात अब बढ़ेगा, क्योंकि इनकी जन्मदर यहां अधिक है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वादा किया था कि धार्मिक शिक्षा देने वाले अति रूढ़िवादी स्कूलों को फंड दिया जाएगा। भले ही ये स्कूल राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की उपेक्षा करते हों।

इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट : धार्मिक-अरबी स्कूलों की हालत बेहद खराब
तेल अवीव में शोरेश संस्थान के अर्थशास्त्री डैन बेन-डेविड ने कहा कि सरकार द्वारा चलाए जा रहे धार्मिक स्कूलों की हालत बेहद खराब है। उनमें सबसे बदतर स्थिति अरबी भाषा के स्कूलों की है। पीसा के सर्वे में उन पारंपरिक स्कूलों काे शामिल भी नहीं किया गया है, जहां राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पढ़ाया ही नहीं जाता है।


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