दुश्मन के लड़ाकू ड्रोन का काल... भारतीय सेना का स्वदेशी ड्रोन जैमर तैयार...एक 'ब्रीफकेस' यूं मचाएगा तबाही

Updated on 23-09-2025 01:09 PM
नई दिल्ली: भारतीय सेना स्वदेशी ड्रोन जैमिंग सिस्टम खरीदने के लिए तैयार है। यह अत्याधुनिक ड्रोन जैमिंग टेक्नोलॉजी भारत की ही एक निजी कंपनी ने विकसित की है। ये सिस्टम 3 किलोमीटर के दायरे में दुश्मन के लड़ाकू विमानों को गिराने में पूरी तरग सक्षम हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने तुर्की में बने सस्ते ड्रोन के झुंड से भारत में दहशत फैलाने की कोशिश की थी। हालांकि, हमारे शक्तिशाली एयर डिफेंस सिस्टम ने उनको पूरी तरह से नाकाम कर दिया था। लेकिन, अब भारतीय सेना जो ड्रोन जैमर खरीदने जा रही है, वह पोर्टेबल है और 'ब्रीफकेस'के आकार का होने की वजह से इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है।

पोर्टेबल ड्रोन जैमिंग सिस्टम खरीद रही सेना

मिंट ने इस ऐतिहासिक डील की जानकारी रखने वाले लोगों से मिली जानकारी के आधार पर एक रिपोर्ट दी है, जिसके मुताबिक भारतीय सेना पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजी लिमिटेड से अत्याधुनिक ड्रोन जैमिंग सिस्टम खरीदने जा रही है। करीब तीन मिलियन डॉलर की यह खरीदारी ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा मंत्रालय के आपातकालीन खरीद प्रावधान के तहत होनी है, जिसके लिए जल्द ही करार होने वाली है। कंपनी ने इसी साल जुलाई में पोर्टेबल और है
डहेल्ड ड्रोन जैमिंग सिस्टम का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर अमित महाजन ने बताया कि अब 'चिमेरा 200 (Chimera 200) को 20 यूनिट की सप्लाई के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है, जिसे पहले ही फील्ड में भारतीय सेना के दिग्गजों को दिखाया जा चुका है कि यह 3 किलोमीटर रेडियस में काम कर रहा है।'

फ्रांस के एयर डिफेंस प्रोवाइडर का भी ऑर्डर

यह ड्रोन जैमर ऑफिस ब्रीफकेस के आकार का है और पारस डिफेंस ने इसे सेंटम इलेक्ट्रॉनिक्स के सहयोग से बनाया है। यह कंपनी भी डिफेंस से जुड़े उपकरण बनाती है। 1 जुलाई को ही कंपनी को चिमेरा 200 के लिए फ्रांस की एयर डिफेंस सर्विस प्रोवाइडर सेरबैर (Cerbair) से 2.6 मिलियन डॉलर का ऑर्डर मिला था, जो कि पहला ऑर्डर था। महाजन ने बताया कि एक ड्रोन जैमर की कीमत लगभग 136,000 डॉलर है। महाजन का कहना है, 'हमने अभी तक उत्पाद की सक्रिय मार्केटिंग नहीं की है; और रक्षा मंत्रालय से आपातकालीन खरीद में रुचि दिखाने के साथ हमें जो पहला कमर्शियल ऑर्डर मिला है, वह बढ़ती जियो-पॉलिटिकल अशांति के समय में कॉम्पैक्ट डिफेंस टेक्नोलॉजी की जरूरत से पैदा हुई एक स्वाभाविक इच्छा है।'

सेना और वायुसेना दोनों के आ सकता है काम

रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय के लिए काम करने वाले एक सीनियर कंसल्टेंट के हवाले से बताया गया है कि इस तरह के एयर डिफेंस उपकरण खरीदने की जरूरत भारतीय सेना और वायुसेना दोनों की लंबे समय से रही है। हालांकि, यह करार अभी तक फाइनल नहीं हुआ है, इसलिए उसने अपना नाम नहीं जाहिर होने देने का अनुरोध किया। उसके मुताबिक सशस्त्र सेना के लिए इस पोर्टेबल ड्रोन जैमर सिस्टम का सौदा तीन महीने के भीतर हो जाने की उम्मीद है।

बदलते संघर्षों के साथ बदलती जरूरत

एक्सपर्ट का कहना है कि भारत के मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम में भारी तोपखाने शामिल हैं, जो प्रभावी तो हैं, लेकिन उन्हें कहीं लाना ले जाना उतना आसान नहीं है। पोर्टेबल जैमर इस समस्या का आसान समाधान है, जो न सिर्फ दुश्मन के ड्रोन का पता लगा सकता है, बल्कि टारगेट को जाम करके नाकाम भी कर सकता है। एक ग्लोबल थिंक टैंक के एक सिक्योरिटी एक्सपर्ट ने नाम नहीं जाहिर होने की शर्त पर कहा, 'रूसी-400 ट्रायंफ समेत मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम बड़े संघर्षों के लिए हैं। लेकिन, आधुनिक जमाने में तेजी से बदलते जियोपॉलिटिकल संघर्षों ने इस क्षेत्र को भी बदल दिया है और आज की जरूरत ऐसे एयर डिफेंस सिस्टम की भी है, जिसे तैनात करना आसान हो।'

पोर्टेबल जैमर एयर डिफेंस की पहली कतार

एक्सर्ट का कहना है कि 'जिस तरह से लड़ाकू ड्रोन से होने वाले हमले तेजी से सामान्य हो रहे हैं, जैसा कि इस अप्रैल (मई में) में भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ समय के लिए हुआ था, पोर्टेबल जैमर भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम के लिए पहली कतार के महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर बन सकते हैं।' रिपोर्ट के अनुसार इस मामले पर रक्षा मंत्रालय को भेजे गए मेल का आखिर समय तक जवाब नहीं मिला।


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