अमेरिका की जनता पर बहुत भारी पड़ रहा टैरिफ... दिग्गज अर्थशास्त्री ने खोली डोनाल्ड ट्रंप की पोल

Updated on 07-10-2025 01:27 PM
नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के कई देशों पर जमकर टैरिफ लगाया है। भारत पर सबसे ज्यादा 50% टैरिफ लगाया गया है। इसमें रूस से कच्चा तेल खरीदने पर 25% का अतिरक्त टैरिफ शामिल है। लेकिन कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसका अमेरिका पर उल्टा असर हो रहा है। इसका बोझ अमेरिका की कंपनियों और वहां की जनता को उठाना पड़ रहा है। कुछ जानकारों का कहना है कि यह अमेरिका के लिए बुरा है और बाकी दुनिया के लिए अच्छा है। इनमें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर और IMF की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ भी शामिल है।

भारतीय मूल की गोपीनाथ ने अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए गए टैरिफ के अब तक के नतीजों को निगेटिव बताया है। उनका कहना है कि ट्रंप द्वारा टैरिफ की घोषणा के छह महीने बाद भी इसका कोई खास नतीजा नहीं निकला है। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "टैरिफ की घोषणा को छह महीने हो गए हैं। अमेरिका के टैरिफ से क्या हासिल हुआ? क्या सरकार के लिए राजस्व बढ़ा? हां, काफी बढ़ा। लेकिन यह पैसा लगभग पूरी तरह से अमेरिकी कंपनियों और कुछ हद तक अमेरिकी उपभोक्ताओं से ही लिया गया। तो इसने अमेरिकी कंपनियों/उपभोक्ताओं पर एक टैक्स की तरह काम किया।

फायदा कम, नुकसान ज्यादा?

गोपीनाथ ने कहा, "क्या महंगाई बढ़ी? हां, कुल मिलाकर थोड़ी महंगाई बढ़ी। खासकर घरेलू उपकरणों, फर्नीचर और कॉफी जैसी चीजों के दाम थोड़े बढ़े। अगला सवाल है कि क्या व्यापार संतुलन सुधरा? अभी तक इसका कोई संकेत नहीं है। क्या अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिला? इसका भी कोई संकेत नहीं है। कुल मिलाकर, इन टैरिफ का स्कोरकार्ड निगेटिव है।" ट्रंप ने 2 अप्रैल को अपने ट्रेडिंग पार्टनर्स पर बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए थे।कई विशेषज्ञों और आलोचकों ने ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कर्ज में डूबे अमेरिका के लिए टैरिफ बढ़ाना कोई समाधान नहीं है। टैरिफ के आलोचकों में लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के डीन एंड्रेस वेलास्को भी शामिल हैं। उनका कहना है कि अमेरिका ने राजनीतिक कारणों से टैरिफ लगाए हैं, आर्थिक कारणों से नहीं। जानकारों का कहना है कि टैरिफ से अमेरिका दुनिया में अलग-थलग पड़ जाएगा। दूसरे देशों के बीच व्यापार समझौते बढ़ेंगे और वे अमेरिका पर बहुत कम निर्भर रहेंगे।

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