रिश्तेदार को कैंसर हुआ तो शुरू की जैविक खेती; हर साल कमाते हैं 15 लाख रुपए

Updated on 24-02-2023 06:22 PM

कैंसर के डर ने एक वाइस प्रिंसिपल और चार्टर्ड अकाउंटेंट को जैविक खेती करने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत छोटे पैमाने पर की, लेकिन अब 18 एकड़ में अलग-अलग फसलें उगा रहा है। इनमें शिमला मिर्च, तरबूज, खरबूज, टमाटर, लौकी, बैंगन आदि शामिल हैं। इस बार उन्होंने एक एकड़ में शिमला मिर्च लगाई है। वह इसे बुरहानपुर, इंदौर के अलावा महाराष्ट्र के जलगांव में बेचते हैं। हर साल करीब 15 लाख रुपए का मुनाफा कमाते हैं।

हम बात कर रहे हैं बुरहानपुर जिले की नेपानगर तहसील के किसान गोपाल राठौड़ की। ग्राम अंबाड़ा के रहने वाले गोपाल कॉमर्स से पोस्ट ग्रेजुएट हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह महाराष्ट्र के प्राइवेट एग्रीकल्चर कॉलेज में वाइस प्रिंसिपल बन गए। इसी बीच, उन्होंने खेती करने का मन बनाया।

पहले केमिकल फर्टिलाइजर और रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कर खेती करते थे, लेकिन जीवन में ऐसा मोड़ आया, जब उनके एक रिश्तेदार की तबीयत खराब हुई। उनको मुंबई के अस्पताल में भर्ती कराया गया। पता चला कि उनको कैंसर है। उनकी तीमारदारी के लिए गोपाल टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल में रहे। वहां कुछ ऐसी सामाजिक संस्थाओं के संपर्क में आए, जिन्होंने बताया कि केमिकलयुक्त खेती से कैंसर का खतरा रहता है। उनकी आंखें खुली और उन्होंने जैविक खेती करने का मन बनाया।

पहली बार में कम, बाद में बढ़ने लगा उत्पाद

गोपाल राठौड़ की मानें तो शुरुआती चार-पांच साल में जैविक खेती से कम उत्पादन हुआ। बाजार में उसका उचित मूल्य भी नहीं मिल पाया, तभी वॉट्सएप ग्रुप बनाया। लोगों को इससे जोड़कर जैविक खेती के प्रति जागरूक करने लगे। इसके बाद लोगों ने जैविक के प्रति रुचि दिखाई। अपने ऑर्गेनिक उत्पाद के थोड़े से प्रचार से बाजार में भी अच्छे दाम मिलने लगे।

12 लाख खर्च कर आधा एकड़ में पॉली हाउस बनाया

किसान गोपाल राठौड़ ने दो साल पहले करीब 12 लाख रुपए खर्च कर पॉली हाउस बनाया। इसमें जैविक तरीके से सब्जी फसल शिमला मिर्च और टमाटर की खेती की। पॉली हाउस में सब्जियों के लिए बेड बनवाया। सिंचाई के लिए ड्रिप मल्च बिछाकर कुछ दूरी पर शिमला मिर्च के बीज की बुआई की। पिछले साल 60 टन शिमला मिर्च उत्पादित की। इस बार एक एकड़ में शिमला मिर्च लगाई, जबकि अन्य में दूसरी सब्जियां लगाई। मौसम के हिसाब से फ्रूट्स लगाते हैं।

ऐसे करते हैं मार्केटिंग

किसान गोपाल एक वॉट्सएप ग्रुप के माध्यम से लोगों को जानकारी देते हैं। ऑर्डर के हिसाब से लोगों को घर तक जैविक सब्जियां पहुंचाते हैं। खास है कि इससे गोपाल को बाजार से ज्यादा दाम भी मिलते हैं। गोपाल के अनुसार एक एकड़ के खेत में एक लाख रुपए खर्च आता है। शुद्ध मुनाफा हर साल करीब 15 लाख रुपए हो जाता है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका पॉली हाउस निभा रहा है, जिसके माध्यम से गोपाल बेहतर शिमला मिर्च, टमाटर का उत्पादन कर रहे हैं।

यहां जाता है माल

बुरहानपुर, इंदौर, जलगांव में सब्जी की डिमांड अधिक है। यहां हर साल किसान गोपाल माल भेजते हैं।

ऐसे की खेती की शुरुआत

किसान गोपाल ने एमकॉम, सीए ( चार्टर्ड अकाउंटेंट) किया। जॉब की। सात साल एग्रीकल्चर कॉलेज महाराष्ट्र में वाइस प्रिंसिपल की नौकरी की। काम करते समय देखा कि किस तरह प्लॉट तैयार होते हैं। कंपनियों के सीड प्रोडक्शन होते हैं। वहां से खेती करने का विचार मन में आया। तब हालात ठीक नहीं थे, इसलिए छोटे स्तर पर खेती स्टार्ट की। सात साल जॉब कर फिर नौकरी छोड़कर यहां खेती करना शुरू किया

फैमिली पैक बनाकर देते हैं

किसान राठौड़ फैमिली पैक बनाकर देते हैं, जिसमें डेली यूज की सब्जियां, फल शामिल होते हैं। वह सब्जी, भाजी फ्रूट और बैंगन, टमाटर, गिलकी, करेला, लौकी, शिमला मिर्च, हरी मिर्च आदि फैमिली पैक बनाकर देते हैं। सीजन के हिसाब से फ्रूट भी चेंज करते हैं।

मेरी मां अनपढ़ थीं, लेकिन वो रासायनिक खेती के सख्त खिलाफ थी। जब मैं 12 साल का हुआ तो पिता का निधन हो गया। हमारी जीविका का साधन केवल हमारे खेत थे। मैं मां के साथ खेत में जाता था। उस वक्त हमारे पड़ोस के खेत वाले फसल बढ़ाने के लिए रासायनिक चीजों का जमकर उपयोग करते थे, तब मेरी मां देसी तरीकों पर फोकस करती थीं। जैविक खेती को लेकर जो दीवानगी है, वो मेरी मां ने ही मुझे दी है। ये कहना है धार जिले के ग्राम लबरावदा के किसान नरेंद्र सिंह राठौर का। ये वो ही नरेंद्र है, जिन्हें मुख्यमंत्री ने जैविक खेती करने और उसे बढ़ावा देने के लिए उत्तम किसान अवॉर्ड दिया है। 

ड्रिप मल्चिंग से आधे एकड़ में 3 लाख की कमाई

वो पेशे से टीचर हैं, लेकिन विरासत में खेती मिली हुई है, इसलिए वे 'किसान टीचर' हैं। जब आधुनिक खेती की बात आई तो इंटरनेट पर सर्च किया। वहां ड्रिप मल्चिंग के बारे में जानकारी मिली। एक बार नुकसान हुआ तो हारे नहीं और फिर से प्रयास किया। नतीजा यह हुआ कि फायदा मिलने लगा। अब उनके देखा देखी बाकी किसान भी यही पद्धिति अपनाकर खेती कर रहे हैं।​​​​​​​ 


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