शेख हसीना ने 15 साल की सत्ता गंवाई, 3 वजहें:आरक्षण पर फैसला, प्रदर्शनकारियों को गद्दार कहा, बंगाल के कसाई से तुलना की

Updated on 06-08-2024 01:16 PM

बांग्लादेश में शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। वे देश छोड़कर भारत पहुंच चुकी हैं। बांग्लादेश के आर्मी चीफ जनरल वकार-उज-जमान ने कहा कि सेना अंतरिम सरकार बनाएगी।

राजधानी ढाका सहित देशभर में सेना तैनात कर दी गई है। कुछ समय पहले तक शेख हसीना को दुनिया के प्रभावशाली लीडर्स में गिना जा रहा था। उन्हें बांग्लादेश की इकोनॉमी को बदलने वाला मसीहा कहा जाता था।

बांग्लादेश में निवेश के लिए भारत और चीन उन्हें लुभाने की कोशिशों में जुटे थे। अब ऐसा क्या हो गया कि 15 साल से सत्ता पर काबिज हसीना खुद अपने देश में सुरक्षित नहीं रहीं और भारत आ गई।

शेख हसीना के पतन की कहानी की शुरुआत 2 महीने पहले 5 जून को ढाका हाईकोर्ट के फैसले से शुरू हुई। स्टोरी में वे 60 दिन की वे 3 घटनाएं, जिसके चलते उन्होंने 15 साल की सत्ता गंवाई...

पहली वजह: आरक्षण पर ढाका हाईकोर्ट का फैसला, जिससे सामान्य वर्ग के छात्र भड़के
बांग्लादेश 1971 में आजाद हुआ था। इसी साल वहां पर 80 फीसदी कोटा सिस्टम लागू हुआ। बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों को नौकरी में 30%, पिछड़े जिलों के लिए 40%, महिलाओं के लिए 10% आरक्षण दिया गया। सामान्य छात्रों के लिए सिर्फ 20% सीटें रखी गईं।

कुछ विरोध के बाद 1976 में पिछड़े जिलों के लिए आरक्षण को 20% कर दिया गया। सामान्य छात्रों को इसका थोड़ा फायदा मिला। उनके लिए 40% सीटें हो गईं। 1985 में पिछड़े जिलों का आरक्षण और घटा कर 10% कर दिया गया और अल्पसंख्यकों के लिए 5% कोटा जोड़ा गया। इससे सामान्य छात्रों के लिए 45% सीटें हो गईं।

शुरू में स्वतंत्रता सेनानियों के बेटे-बेटियों को ही आरक्षण मिलता था। कुछ सालों बाद स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों को मिलने वाली सीटें खाली रहने लगीं। इसका फायदा सामान्य छात्रों को मिलता था। हालांकि 2009 में स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को भी आरक्षण मिलने लगा।

इससे सामान्य छात्रों की नाराजगी बढ़ गई। साल 2012 में विकलांग छात्रों के लिए भी 1% कोटा जोड़ दिया गया। इससे कुल कोटा 56% हो गया। सामान्य वर्ग के 44% सीटें ही बचीं।

साल 2018 में 4 महीने तक छात्रों के प्रदर्शन के बाद हसीना सरकार ने कोटा सिस्टम को ही खत्म कर दिया था। हसीना की सरकार का मानना था कि अगर स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार वालों को आरक्षण नहीं मिलेगा तो किसी को नहीं मिलेगा।

हालांकि 5 जून 2024 को ढाका हाईकोर्ट ने एक फैसला सुनाया और सरकार को पुराना कोटा सिस्टम (2012) बहाल करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि 2018 से पहले जैसे आरक्षण मिलता था, उसे फिर से उसी तरह लागू किया जाए। इससे सामान्य वर्ग के छात्र भड़क गए और सड़कों पर उतर आए।

दूसरी वजह: शेख हसीना ने प्रदर्शनकारियों को पाक समर्थक रजाकार यानी गद्दार कह दिया
"अगर स्वतंत्रता सेनानियों के बेटे-पोते को आरक्षण नहीं मिलेगा तो क्या रजाकारों के पोते-पोतियों को आरक्षण मिलेगा?"

प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 14 जुलाई को दिए एक इंटरव्यू में ये बात कही थी। रजाकारों के जिक्र भर से ढाका में चल रहा आरक्षण विरोधी प्रदर्शन हिंसक हो गया। दरअसल बांग्लादेश में गद्दारों को रजाकार कहा जाता है। प्रदर्शनकारी छात्रों ने उस सरकारी टीवी चैनल में आग लगा दी, जिसे PM हसीना ने इंटरव्यू दिया था।

ढाका यूनिवर्सिटी में 'तूई के, आमी के रजाकार, रजाकार' के नारे गूंजने लगे। प्रदर्शन हिंसक हो गया, महीने भर में 300 से ज्यादा लोगों को जान गई। इनमें ज्यादातर छात्र थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शेख हसीना ने प्रदर्शनकारियों को अपमानित करने के लिए और जनता के बीच उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए उन्हें रजाकार बुलाया था। अपनी मांग के लिए प्रदर्शन कर रहे छात्रों को रजाकार बुलाना हसीना को भारी पड़ा गया।

बयान से पहले शेख हसीना ने भी ये नहीं सोचा होगा कि प्रदर्शनकारियों को रजाकार कह देना उनकी सरकार को इतना भारी पड़ेगा कि बांग्लादेश का प्रदर्शन पूरी दुनिया की निगाह में आ जाएगा। छात्रों ने 'रजाकार' शब्द को सरकार के खिलाफ अपना हथियार बना लिया। उन्होंने जनता के बीच ये मैसेज दिया कि सरकार कैसे परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को सिर्फ अपनी मांग रखने के लिए 'गद्दार' साबित करना चाहती है।

बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार के अनुसार, प्रधानमंत्री के बाद उनकी पार्टी के बाकी नेताओं ने भी इसी तरह के बयान देकर प्रदर्शनकारी छात्रों के आक्रोश को और भड़काया। समाज कल्याण मंत्री दीपू मोनी ने कहा- रजाकारों को बांग्लादेश के पवित्र झंडे को थामने का कोई हक नहीं है।

वहीं, सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री मोहम्मद अली अराफात ने कहा- रजाकारों की कोई भी मांग स्वीकार नहीं की जाएगी। नेताओं के ऐसे बयानों से उग्र हुए छात्रों का प्रदर्शन तेज हो गया। सरकार जिन्हें गद्दार यानी रजाकार साबित करना चाहती थी, वे जनता की नजरों में हीरो बन गए।

हसीना ने जिन रजाकारों का जिक्र किया, वे आखिर हैं कौन?
साल 1971। बांग्लादेश के लिए हुई जंग में पाकिस्तान को सरेंडर करे 2 दिन गुजर चुके थे। 18 दिसंबर की सुबह ढाका के बाहरी इलाके में एक के बाद एक 125 लाशें मिलतीं हैं। सभी के हाथ पीछे बंधे थे।

इनकी पहचान कर पाना भी मुश्किल हो रहा था। उनमें से कुछ को गोली मारी गई थी, कुछ का गला घोंटा गया था तो कुछ को राइफल में लगे चाकू से गोद दिया गया था। ये सभी 125 लोग बांग्लादेश की जानी-मानी हस्तियां थीं।

ये उन 300 लोगों में से थे, जिन्हें 'रजाकारों' ने बंधक बना लिया था, ताकि उनकी जान के बदले वे बांग्लादेश में लगातार आगे बढ़ रही भारतीय सेना से अपनी बात मनवा सकें। हालांकि, जैसे ही उन्हें पाकिस्तान के घुटने टेक देने की भनक लगी, रजाकारों ने सभी बंधकों को मार डाला।

ढाका के बाहर एक फैक्ट्री और मस्जिद को रजाकारों ने ठिकाना बनाया था। यहां से वे उन लोगों पर भी गोलियां बरसा रहे थे, जो अपने रिश्तेदारों की लाशें पहचानने के लिए वहां पहुंच रहे थे।

भारतीय सैनिकों को जैसे ही इसकी जानकारी मिली, वे तुरंत वहां पहुंचे और फैक्ट्री को रजाकारों से छुड़ाया। फैक्ट्री के पास और भी बंगालियों की लाशें मिलीं, जिन्हें गड्ढों में फेंका गया था। भारतीय सेना की कार्रवाई में जिंदा बचे 2 रजाकारों ने सरेंडर किया। इन्होंने 300 लोगों की जान लेने की बात कबूल की।

1971 की जंग के दौरान बांग्लादेश में 'रजाकार' होना कोई आम बात नहीं रह गई थी।​​​​​​ रजाकार अरबी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है- स्वयंसेवक या साथ देने वाला। हालांकि, बांग्लादेश में इसे बहुत अपमानजनक माना जाने लगा। रजाकार का मतलब गद्दार हो गया, जिन्होंने पाकिस्तानी जनरल टिक्का खान के इशारों पर 1971 की लड़ाई में अपनों का ही खून बहाया।

पूर्वी पाकिस्तान पहुंचकर टिक्का खान ने आजादी के लिए प्रदर्शन कर रहे मुक्ति वाहिनी मोर्चे पर लगाम लगाने के लिए तीन तरह की मिलिशिया बनाई। अल बद्र, अल शम्स और रजाकार। टिक्का खान के आदेश पर जमात-ए-इस्लामी के नेता मौलाना अबुल कलाम को रजाकारों का नेता बनाया गया। शुरुआत में रजाकार सेना में सिर्फ 96 लोग थे।

बाद में इनकी संख्या 50,000 के करीब पहुंच गई। रजाकारों में बंटवारे के वक्त बिहार से बांग्लादेश जाने वाले उर्दू भाषी मुस्लिम शामिल थे। ये पाकिस्तान के समर्थक थे और नहीं चाहते थे कि भाषा के नाम पर अलग देश बांग्लादेश बने।

येलेना बीबरमैन ने अपनी एक किताब ‘गैम्बलिंग विद वॉयलेंस: स्टेट आउटसोर्सिंग ऑफ वॉर इन पाकिस्तान एंड इंडिया’ में पूर्व रजाकार के हवाले से लिखा है कि वे गरीब और अनपढ़ थे। उन्हें यकीन था कि वे इस्लाम के लिए लड़ रहे हैं।

बांग्लादेश में टिक्का खान के ऑपरेशन को सर्चलाइट नाम से भी जाना जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना और मिलिशिया की बर्बर कार्रवाई में लाखों बंगाली मारे गए थे। इसके चलते टिक्का खान ‘बंगाल का कसाई’ कहा जाने लगा।

तीसरी वजह: शेख हसीना की छात्रों की मौत पर चुप्पी, मेट्रो जलाने पर आंसू बहाए
शेख हसीना बांग्लादेश में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद हुए नुकसान को देखने के लिए 25 जुलाई को मीरपुर-10 मेट्रो स्टेशन का दौरा करने पहुंची। इस दौरान मेट्रो स्टेशन में हुई तोड़-फोड़ को देखकर शेख हसीना के आंसू निकल पड़े।

शेख हसीना अपने आंसुओं को टिशू पेपर से पोछतें हुए नजर आईं। हालांकि उन्होंने प्रदर्शन में 200 से ज्यादा छात्रों की मौत पर एक बार भी कुछ नहीं कहा।

पिछले महीने विरोध प्रदर्शन को लीड कर रहे 6 लोगों को डिटेक्टिव ब्रांच ने सेफ रखने के नाम पर 6 दिनों तक बंधक बनाकर रखा था। इनमें से नाहिद इस्लाम, आसिफ महमूद और अबू बकर मजूमदार घायल थे और अस्पतालों में इलाज करा रहे थे।

उन्हें वहां से उठा लिया गया। इन सभी से आंदोलन को वापस लेने के लिए जबरदस्ती वीडियो बनवाया गया। जब ये कैद में थे, तब गृह मंत्री ये दावा कर रहे थे कि इन्होंने अपनी मर्जी से आंदोलन को खत्म करने की बात कही है। जब मामला खुला तो प्रदर्शनकारियों का गुस्सा और भड़क गया। प्रदर्शन इतना बढ़ गया कि हजारों लोग सड़कों पर उतर गए।



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