एमएसपी पर खरीदी होने से सरसों फसल का रकबा बढ़ाने की तैयारी

Updated on 08-10-2025 01:32 PM

राजनांदगांव।  घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजारों मेें भी सरसों की मांग में तेजी आने के कारण किसानों के बीच सरसों फसल की लोकप्रियता बढ़  रही है। जिले में 1100 से 1200 हेक्टेयर में सरसों की खेती की जाती है, परन्तु इस वर्ष यह रकबा बढऩे की उम्मीद है। इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस वर्ष रबी 2025-26 में प्राईस सपोर्ट स्कीम के तहत नाफेड द्वारा राज्य शासन के साथ मिलकर इस साल सरसों फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी भी की जाएगी। भारत सरकार ने भी गतवर्ष की तुलना में सरसों फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी बढ़ोतरी की है। भारत में सरसों का तेल लगभग सभी घरों में खाद्य तेल के रूप में काम आता है। सरसों की खेती की खास बात यह है कि सिंचित और असिंचित, दोनों ही तरह के खेतों में की जा सकती है। सोयाबीन और पाम के बाद सरसों विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तिलहन फसल हैं। मुख्य तौर पर सरसों के तेल के साथ-साथ सरसों के पत्तों का उपयोग सब्जी बनाने में होता है और सरसों की खली भी बनती है, जो कि दुधारू पशुओं को खिलाने के काम आती है।

उप संचालक कृषि  टीकम सिंह ठाकुर ने बताया कि सरसों फसल में मात्र 300 एमएम पानी में सिंचाई हो जाता है, जो ग्रीष्मकालीन धान की तुलना में पांच गुना कम है। साथ ही इसका उत्पादन लागत भी 10 हजार रूपए से 11 हजार रूपए ही है। जिसमें किसानों को बाजार मूल्य 6000 से 6200 प्राप्त होता है, जिससे किसान 22 से 23 हजार रूपए शुद्ध लाभ प्रति एकड़ कमाई कर सकते है। इस वर्ष विशेष कार्ययोजना बनाकर सरसों फसल को प्रोत्साहित किया जा रहा है।  सरसों प्रमुख तिलहन फसल में से एक है। रबी की फसल होने के कारण मध्य सितम्बर से मध्य अक्टूबर तक सरसों की बुवाई कर देनी चाहिए। सरसों की फसल का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए 15 से 25 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है। सरसों की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन अच्छी उपज पाने के लिए समतल एवं अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है।

खेत की तैयारी कैसे करें -

सरसों की खेती में भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता होती है, खेत को सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए। इसके बाद दो से तीन जुताई देशी हल या कल्टीवेटर के माध्यम से करना चाहिए। इसकी जुताई करने के बाद खेत में नमी रखने के लिए व खेत समतल करने के लिए पाटा लगाना अतिआवश्यक है। पाटा लगाने से सिंचाई करने में समय व पानी दोनों की बचत होती है।

सरसों की बुवाई के लिए बीज की मात्रा -

जिन खेतों में सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध हो वहां सरसों की फसल की बुवाई के लिए 5 से 6 किलो ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। जिन खेतों में सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध न हों, वहां सरसों की बीज की मात्रा भिन्न हो सकती है। बीज की मात्रा फसल की किस्म के आधार पर निर्भर करती है। यदि फसल की अवधि अधिक दिनों की है तो बीज की मात्रा कम लगेगी और यदि फसल कम अवधि की है तो बीज की मात्रा ज्यादा लगेगी।

सरसों की उन्नत किस्में -

सरसों की खेती के लिए उसकी उन्न्त किस्मों की जानकारी होना भी आवश्यक है, जिससे अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके। सरसों की कई तरह की किस्में सिंचित क्षेत्र व असिंचित क्षेत्र के लिए अलग-अलग हैं। आरएच 30- सिंचित क्षेत्र व असिंचित क्षेत्र दोनों ही परिस्थितियों में गेंहूँ, चना एवं जौ के साथ बुवाई करने के लिए उपयुक्त होती है। टी 59 (वरूणा)- यह किस्म उन क्षेत्रों में अच्छी पैदावार प्रदान करती है, जहां सिंचाई के साधन की उपलब्धता नहीं होती है। इसकी उपज असिंचित क्षेत्र में 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। दाने में तेल की मात्रा 36 प्रतिशत होती है। पूसा बोल्ड  आशीर्वाद (आर.के.)- यह किस्म देर से बुवाई के लिए (25 अक्टूबर से 15 नवंबर तक) उपयुक्त होती है। एनआरसीएचबी 101- यह किस्म उन क्षेत्रों में अच्छी पैदावार प्रदान करती है, जहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था होती है। ये किस्म 20 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन प्रदान करती है।

सरसों की फसल में सिंचाई-

सरसों की फसल में पहली सिंचाई 25 से 30 दिन पर करनी चाहिए तथा दूसरी सिंचाई फलियाँ में दाने भरने की अवस्था में करना चाहिए। यदि जाड़े में वर्षा हो जाती है, तो दूसरी सिंचाई न भी करें तो भी अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। ध्यान रहे सरसों में फूल आने के समय खेत की सिंचाई नहीं करनी चाहिए। सरसों की फसल में सिंचाई सामान्यत: पट्टी विधि द्वारा करनी चाहिए। खेत के आकार के अनुसार 4 से 6 मीटर चौड़ी पट्टी बनाकर सिंचाई करनी चाहिए, इस विधि से सिंचाई करने पर पानी का वितरण पूरे खेत में समान रूप से होता है।

खाद व उर्वरक का प्रयोग-

जिन खेतों में सिंचाई के उपयुक्त साधन उपलब्ध हों वहां के लिए 6 से 12 टन सड़े हुए गोबर की खाद, 160 से 170 किलोग्राम यूरिया, 250 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 50 किलोग्राम म्यूरेट व पोटाश एवं 200 किलोग्राम जिप्सम बुवाई से पूर्व खेत में मिलाना उपयुक्त होता है। यूरिया की आधी मात्रा बुवाई के समय एवं बची हुई आधी मात्रा पहली सिंचाई के बाद खेत में मिला दें। जिन खेतों में सिंचाई के उपयुक्त साधन उपलब्ध न हों, वहां के लिए वर्षा से पूर्व 4 से 5 टन सड़ी हुई गोबर की खाद, 85 से 90 किलोग्राम यूरिया, 125 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 33 किलोग्राम म्यूरेट व पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करते समय खेत में डाल दें।

खरपतवार नियंत्रण -

सरसों की खेती में बुवाई के 15 से 20 दिन बाद खेत से घने पौधों को निकाल देना चाहिए व उनकी आपसी दूरी 15 सेंटीमीटर कर देनी चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवार का नियंत्रण करने के लिए बुवाई के तुरंत बाद 2 से 3 दिन के अंदर पेंडीमेथॉलीन 30 ईसी रसायन की 3.3 लीटर मात्रा को 600 से 800 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

फसल में लगने वाले रोगों का नियंत्रण -

सरसों की फसल में प्रमुख रोग जैसे आल्टरनेरिया, पत्ती झुलसा रोग, सफेद कीट रोग, चूर्णिल आसिता रोग तथा तुलासिता रोग आदि फसल में लगते हैं, इन रोगों के नियंत्रण के लिए मेन्कोजेब रसायन 75 प्रतिशत की 800-1000 लीटर पानी में मिलकर छिड़काव करना चाहिए।

फसल की कटाई और भंडारण-

सरसों की फसल में जब 75 प्रतिशत फलियाँ सुनहरे रंग की हो जाएं, तब फसल को मशीन से या हाथ से काटकर, सुखाकर या मड़ाई करके बीज को अलग कर लेना चाहिए, सरसों निया के बीज जब अच्छी तरह से सूख जाएं तभी उनका भंडारण करना चाहिये। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, वहां इसकी पैदावार 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है तथा जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था है, वहां 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की उपज प्राप्त की जा सकती है।



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