ईरान-अमेरिका जंग में पाकिस्तान की मध्यस्थता सिर्फ मजबूरी, भारत पर बढ़त नहीं: एक्सपर्ट ने खोली पोल

Updated on 26-03-2026 12:20 PM
इस्लामाबाद: ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता करने के पाकिस्तान की कोशिशों की लोग तारीफ कर रहे हैं। कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी पाकिस्तान की सराहना की है। भारत में कांग्रेस ने इसे मोदी सरकार की नाकामी करार दिया है। हालांकि, विदेश नीति के जानकारों ने इसे पाकिस्तान की मजबूरी करार दिया है। उनका कहना है कि ईरान और अमेरिका में मध्यस्थता करने से पाकिस्तान को भारत पर कोई बढ़त नहीं मिली है, बल्कि ऐसा करना इस्लामाबाद की मजबूरी है।

कंवर सिब्बल ने बताया पाकिस्तान की मजबूरी


भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवर सिब्बल ने एक्स पर लिखा, "यह सोचना कि अमेरिका-ईरान युद्ध में मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान को भारत पर क्षेत्रीय बढ़त मिल गई है, स्थिति को गलत समझना है। पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता है। सऊदी क्राउन प्रिंस ने ईरान के मामले में अपना रुख कड़ा कर लिया है और चाहते हैं कि अमेरिका अपने सैन्य अभियान जारी रखे, ताकि ईरान को इस क्षेत्र के लिए भविष्य के खतरे के तौर पर खत्म किया जा सके। उन्हें आशंका है कि अगर ईरान की ताकत को पूरी तरह खत्म नहीं किया गया, तो वह इस क्षेत्र पर अपना दबदबा कायम कर लेगा।"

पाकिस्तान को युद्ध में घसीट सकता है सऊदी अरब


सिब्बल ने आगे कहा, "पाकिस्तान को डर है कि सऊदी क्राउन प्रिंस उस रक्षा समझौते का हवाला देकर पाकिस्तान को ईरान के साथ चल रहे इस संघर्ष में घसीट सकते हैं। सऊदी विशेषज्ञों ने अब इस समझौते का और यहाँ तक कि पाकिस्तान की परमाणु सुरक्षा-छतरी (न्यूक्लियर अंब्रेला) का भी हवाला देना शुरू कर दिया है। इसलिए, पाकिस्तान के पास इस सबसे बुरे हालात से बचने और मध्यस्थता का प्रस्ताव देने का एक बड़ा कारण है, ताकि वह एक निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर सामने आ सके और यह दावा कर सके कि वह किसी का पक्ष नहीं ले रहा है।"

पाकिस्तान की मध्यस्थता का प्रस्ताव कूटनीतिक हताशा


उन्होंने आगे कहा, "पाकिस्तान का मध्यस्थता का प्रस्ताव, कुछ मायनों में, कूटनीतिक हताशा का ही एक कदम है। सऊदी अरब का साथ देने का मतलब होगा, ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल का साथ देना; जिसके पाकिस्तान के अपने घरेलू मामलों पर भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसलिए, हमें यह तर्क देकर अपनी गरिमा को कम नहीं करना चाहिए कि अमेरिका द्वारा भारत के बजाय पाकिस्तान की मध्यस्थता को तरजीह दिए जाने से इस क्षेत्र में हमारी साख या रुतबा कम हो गया है।"

ईरान युद्ध में भारत का मध्यस्थ बनना खतरनाक


कंवर सिब्बल ने कहा, "इसके अलावा, ट्रंप किसी भी मध्यस्थ को इसका श्रेय नहीं देंगे; क्योंकि ऐसा करने का मतलब यह होगा कि वह इस स्थिति को खुद अपने दम पर और अपनी शर्तों पर नहीं संभाल पाए। उनका अहंकार इतना बड़ा है कि उसे संभालना मुश्किल है। यही नहीं, अगर हमने ईरान के साथ मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया, तो इस बात का भी खतरा है कि हम ट्रंप के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने का रास्ता खोल देंगे। बेहतर यही है कि हम इस मामले में बेवजह दखल न दें और इसे जैसा है, वैसा ही रहने दें।"

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