योगी आदित्यनाथ से ज्यादा पीछे नहीं हैं नीतीश कुमार, नीति आयोग के आंकड़े दे रहे गवाही

Updated on 18-07-2023 05:51 PM
नई दिल्ली : जैसे-जैसे देश के दूर-दराज के इलाकों तक विकास पहुंच रहा है, वैसे ही लोगों का जीवन स्तर सुधर रहा है। नीति आयोग ने बहुआयामी गरीब सूचकांक 2023 रिपोर्ट (Multidimensional Poor Index 2023 Report) जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल में करोडों लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2015-16 से 2019-21 के दौरान 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से मुक्त हुए हैं। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से सबसे अधिक संख्या में लोग गरीबी से बाहर निकले। लेकिन बिहार (Bihar) भी ज्यादा पीछे नहीं है। यूपी के बाद बिहार और मध्य प्रदेश से सबसे ज्यादा लोग गरीबी से बाहर निकले हैं।

उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा लोग गरीबी से बाहर निकले

लोगों की संख्या के हिसाब से देखें, तो योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं। इस अवधि में उत्तर प्रदेश से कुल 3,42,72,484 लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले। इसके बाद दूसरे नंबर पर बिहार रहा, जहां से 2,25,11,679 लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले। मध्य प्रदेश से 1,35,69,242 लोग गरीबी से बाहर निकले। इसके बाद राजस्थान से 1,08,16,230 लोग गरीबी से बाहर निकले।

देश में 9.89% कम हुए गरीब


रिपोर्ट के अनुसार भारत में बहुआयामी गरीबों की संख्या में 9.89 फीसदी की गिरावट आई है। साल 2015-16 में ये 24.85 फीसदी थे, जो 2019-21 में घटकर 14.91 फीसदी रह गए। इस रिपोर्ट का नाम 'नेशनल मल्टी डायमेंशनल पोवर्टी इंडेक्स : ए प्रोग्रेस रिव्यू 2023' है। यह रिपोर्ट नीति आयोग ने सोमवार को दिल्ली में जारी की थी।


ग्रामीण इलाकों में सबसे तेजी से आई गिरावट

रिपोर्ट में कहा गया कि ग्रामीण इलाकों में गरीबी में सबसे तेजी से गिरावट आई। यह 32.59 फीसदी से गिरकर 19.28 फीसदी पर आ गई। इसकी वजह बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान जैसे राज्यों में बहुआयामी रूप से गरीब लोगों की संख्या में कमी आना है। केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ दिल्ली, केरल, गोवा और तमिलनाडु में बहुआयामी गरीबी का सामना करने वाले लोगों की संख्या सबसे कम है। बिहार, झारखंड, मेघालय, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश चार्ट में सबसे ऊपर हैं, जहां बहुआयामी रूप से गरीब कुल आबादी का प्रतिशत अधिक है। इस अवधि के दौरान शहरी क्षेत्रों में बहुआयामी गरीबी 8.65% से घटकर 5.27% पर आ गई। नीति आयोग ने एक बयान में कहा, 'उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 3.43 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले।' यह रिपोर्ट नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने जारी की है।


कैसे मापी जाती है बहुआयामी गरीबी

बहुआयामी गरीबी को मापते समय 3 चीजें देखी जाती हैं। हेल्थ, एजुकेशन और स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग। तीनों का एक तिहाई-एक तिहाई हिस्सा होता है। हेल्थ में पोषण, बाल एवं किशोर मृत्यु दर और मां का स्वास्थ्य देखा जाता है। एजुकेशन में स्कूली शिक्षा के वर्ष और विद्यालय में उपस्थिति देखी जाती है। स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग में खाना पकाने का ईंधन, साफ-सफाई, पीने का पानी, आवास, बिजली, एसेट्स और बैंक खाता देखा जाता है।


इस मामले में बिहार टॉप पर

देश में सबसे ज्यादा गरीबी अनुपात बिहार में है। बिहार में बहुआयामी गरीबों की संख्या 2015-16 में कुल जनसंख्या की 51.89 फीसदी थी। यह 2019-21 में घटकर 33.67 फीसदी रह गई। दूसरे नंबर पर झारखंड है, जहां गरीबों की संख्या 42.10 फीसदी से घटकर 28.81 फीसदी रह गई। तीसरे नंबर पर मेघालय है, जहां यह संख्या 32.54 फीसदी से घटकर 27.79 फीसदी रह गई। चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश है, जहैं यह संख्या 37.68 फीसदी से घटकर 22.93 फीसदी रह गई। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो इस अवधि में बहुआयामी गरीबों की संख्या में सबसे अधिक गिरावट बिहार में 18.13 फीसदी आई है। इसके बाद मध्य प्रदेश में 15.94 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 14.75 फीसदी, ओडिशा में 13.65 फीसदी और राजस्थान में 13.56 फीसदी बहुआयामी गरीब घटे।

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