
इंदौर से करीब 30 किमी दूर है चोरल। यहां की ख़ूबसूरती, नदी को देखने के लिए इंदौर और आसपास के कई लोग यहां आते हैं। बारिश के मौसम में हरियाली और सुंदरता काफी बढ़ जाती है। मगर यहां कुछ चीजें ऐसी हैं, जिस पर लगातार वन विभाग की टीम नजरें जमाए हुए है। पिछले कुछ महीनों में चोरल के जंगल में इतना कुछ हुआ है, जिसका रिजल्ट बारिश के बाद देखने को मिलेगा।
चलिए जानते हैं चोरल के जंगल के अंदर क्या कुछ हुआ है…
चोरल का जंगल कई किमी इलाके में फैला हुआ है। यहां पर सागौन, शीशम के साथ ही विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे हैं। पिछले कुछ महीनों से इस जंगल को घना करने की कवायद चल रही है। इसमें लिए वन विभाग की टीमों के साथ ही वन समिति के सदस्य भी जुटे हैं। यह काम जंगल को घना करने के साथ ही समिति सदस्यों को रोजगार भी दिला रहा है।
भारी मशक्कत का काम है
जंगल के अंदर पौधा रोपण और फेंसिंग करना काफी मशक्कत का काम है। जंगल में जहां तक वाहन जा सकते हैं, वहीं तक सामान लाया जा सकता है। इसके बाद सामान को ढोने का काम वन विभाग की टीम और सदस्यों को करना पड़ता है। फेंसिंग के लिए तार और सीमेंट के पोल भी कंधे पर उठाकर ही जंगल के अंदर जहां लगाना है, वहां तक लाना पड़ते हैं। कई बार ऊंचाई वाली जगह तक सदस्यों को और वन विभाग की टीम को पूरा सामान लेकर चढ़ना पड़ता है। पथरीले और उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर टीम इतना भारी समान लेकर यहां तक पहुंचती है।
फेंसिंग करने में भी दिक्कत
टीम को फेंसिंग करने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सीमेंट के पोल गाड़ने के लिए गड्ढे करना पड़ते है। जिसके लिए मशीन भी कंधों पर या दोनों से तीन लोगों को मिलकर ही लाना पड़ती है। जिसके बाद जमीन में गड्ढे किए जाते है। फेंसिंग के बाद यहां पर लोहे के तार बांधने में टीम को दिक्कत का सामना करना पड़ता है। खराब रास्ता इसमें बड़ी चुनौती बनता है।
मशीन नहीं पहुंच पाती
जो काम सामान्य रास्तों, समतल जमीन पर आसानी से हो जाता है। वह काम जंगल में करना उतना ही परेशानी वाला बन जाता है। मशीन से जो काम कुछ ही मिनटों में या कम समय में हो जाता है, वह काम जंगल में करने में काफी समय लगता है। जंगल में जमीन भी ऊपर-नीचे रहती है। जिसके कारण काम करने में दिक्कत होती है। वहीं दूसरी तरफ यहां तक मशीन भी नहीं पहुंच पाती है। इसलिए कई बार गड्ढे भी हाथों से ही खोदना पड़ते हैं।
जंगल की जमीन का कब्जा हटाया
रेंजर रविकांत जैन ने बताया कि चोरल के जंगल में कई जगह कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया था। जिन्हें काफी समझाइश के बाद हटाया गया है। कई बार जंगल में पेड़ों के गिरने के कारण, कब्जे के कारण या फिर कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा आग लगाए जाने के कारण जंगल का उतना हिस्सा खाली हो जाता है, यानी वहां पेड़-पौधे नहीं होते है। ऐसे में उस हिस्से पर पौधा रोपण करके जंगल को घना किया जा रहा है।
फेंसिंग कर तैयार करते जल संरचना
रेंजर रविकांत जैन ने बताया कि जंगल में जो जगह खाली रहती है वहां वन को बढ़ाने के लिए पौधारोपण करते है। सबसे पहले इसके लिए जमीन तैयारी की जाती है। इसके लिए पहले फेंसिंग फिर जल संरचना तैयार की जाती है। जिससे उसका जल स्तर मेंटेन हो जाए। फिर यहां गड्ढे किए जाते है। फिर यहां पर बारिश के मौसम के पहले इन गड्ढों में पौधे लगाए जाते है। जिसके बाद इनका मेंटेनेंस किया जाता है।
इन स्थानों पर हो रहा पौधरोपण
रेंजर के मुताबिक आशापुरा में जंगल की 40 हेक्टेयर जमीन पर से कब्जा हटा कर वहां पौधरोपण किया जाएगा। चोरल में 20 हेक्टेयर पर पौधा रोपण किया जाएगा। सेंडल में 40 हेक्टेयर में पौधा रोपण किया जाएगा। इसी प्रकार बगोदा बीट में भी 40 हेक्टेयर पर पौधा रोपण किया जाएगा। चोरल में 15 हजार से ज्यादा पौधे लगाए जाएंगे, जबकि अन्य स्थानों पर 20 से 30 हजार पौधे लगाए जाएंगे। इस प्रकार देखा जाए तो करीब डेढ़ लाख से ज्यादा पौधे इन स्थानों पर लगाए जाएंगे।पौधा रोपण में जो स्थानीय प्रजाति के पौधे ही लगाए जाएंगे। जिसमें सागौन, शीशम, साल, चिरौल आदि प्रजाति के पौधे शामिल हैं।
इन दिक्कतों का करना पड़ता है सामना
वन रक्षक अल्केश भूरिया ने बताया कि पौधा रोपण में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जंगल के अंदर तक न तो मशीन आ पाती है न ही कोई गाड़ी। जहां तक गाड़ी आती वहां से पूरा सामान कंधे पर हाथों में उठाकर कई किमी तक चलना पड़ता है। कई बार जब जंगल के अंदर पेड़ गिर जाते हैं तब उन्हें जंगल के अंदर ही काट छांट कर कंधे पर उठाकर कई किमी दूर तक पैदल जाना पड़ता है।