- 17 मई को शिकार की जगह पर लगाए गए कैमरे में नजर आया।
- 18 मई को दोबारा उसी शिकार के पास कैमरे में ट्रैप हुआ।
- 23 मई को फिर गाय का शिकार किया।
- 24 मई को वन विभाग के कैमरे में पगडंडी से जाते हुए दिखा।
- 6 जून को नंदलाई घाटी में सड़क से जा रहे लोगों ने देखा और वीडियो बनाए।
- 9 जून को पीथमपुर के संजय जलाशय के पास भरदला गांव के जंगल में नीलगाय का शिकार किया।
- 18 जून को मलेंडी गांव के जंगल में बुजुर्ग पर किया हमला।
- 23 जून को बड़गोंदा नर्सरी में बाघ के पग चिह्न मिले थे।
- 3 जुलाई को जामनिया में गाय का शिकार किया।
- 6 जुलाई को फिर से लोगों को बड़गोंदा नर्सरी में नजर आया।
ऐसे बनाते हैं अधिकार क्षेत्र
- पेड़ों पर नाखूनों के निशान बनाते हैं।
- जगह-जगह पेशाब व विष्ठा करते हैं।
- शिकार करते हैं।
- लगातार जंगल में घूमते रहते हैं।
शिकारियों पर निगरानी जरूरी
बाघ की मौजूदगी पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर है। बाघों के संरक्षण को लेकर वन विभाग के सामने बड़ी चुनौती क्षेत्र में शिकारियों की सक्रियता पर निगरानी रखना है। इसके लिए ग्रामीण, वनकर्मियों और सूचना तंत्र को मजबूत करना होगा। यहां तक कि जंगल में जल स्रोत को भी बचाना होगा। साथ ही हरियाली को निरंतर बढ़ते रहने की जरूरत है।
-डा. पीसी दुबे, पूर्व पीसीसीएफ
ग्रामीणों को बताएंगे बाघ का महत्व
ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए गांवों में परिचर्चा-नुक्कड़ नाटक का सहारा लिया जाएगा। समय-समय पर वन समितियों व सरपंचों के माध्यम से ग्रामीणों की बैठक लेंगे, ताकि बाघ को बचाया जा सके।