शिक्षकों में विद्यार्थी केन्द्रित शिक्षा का दृष्टिकोण होना आवश्यकता : स्कूल शिक्षा (स्वतंत्र प्रभार) राज्य मंत्री श्री परमार

Updated on 21-02-2023 06:57 PM

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुपालन और क्रियान्वयन के लिए समाज और सरकार दोनों ही प्रतिबद्ध हैं। उच्च शिक्षा से ज्यादा पूर्व प्राथमिक शिक्षा पर जोर देने की आवश्यकता है। शिक्षा पद्धति में शिशु शिक्षा महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ बच्चों को स्वाभाविक प्रवृत्ति और खेल-खेल में सीखने के लिए प्रेरित करना होगा। विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा देने के संकल्प के साथ शिक्षकों को यह प्रयास करना होगा। बच्चों में भारतीय शिक्षा दर्शन के अनुरूप शिक्षा पद्धति के क्रियान्वयन के लिए स्कूल शिक्षा के साथ आँगनवाड़ी केंद्रों में भी इस दृष्टिकोण को स्थापित करने की आवश्कता है, जिससे पूर्व प्राथमिक शिक्षा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का क्रियान्वयन हो सके। यह बात स्कूल शिक्षा (स्वतंत्र प्रभार) एवं सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री श्री इन्दर सिंह परमार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में "प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) स्वरूप एवं संकल्पना" विषय आधारित शैक्षिक संगोष्ठी में कही।

राज्य मंत्री श्री परमार आज राज्य शिक्षा केंद्र (SCERT) एवं विद्या भारती मध्य भारत भोपाल द्वारा महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान सभागृह भोपाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में "प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE ) स्वरूप एवं संकल्पना" विषय आधारित शैक्षिक संगोष्ठी में शामिल हुए।

राज्य मंत्री श्री परमार ने कहा कि भाषाएँ जोड़ने का काम करती हैं। इसी अवधारणा को परिलक्षित करने के उद्देश्य से प्रदेश में स्कूली शिक्षा में तमिल, कन्नड़, गुजराती आदि क्षेत्रीय भाषाओं को सिखाने का कार्य भी किया जायेगा, जिससे यहाँ के बच्चे अन्य राज्यों की भाषाएँ सीख कर लोक व्यवहार और संवाद में निपुण हो सकें। प्रदेश में शिक्षक प्रशिक्षण नीति बनाई गई है। राज्य मंत्री श्री परमार ने कहा कि पूर्व प्राथमिक शिक्षा के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के प्रावधानों में भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुपालन में व्यापक संशोधन की आवश्यकता है, जिस पर विचार मंथन किया जा रहा है। प्रदेश में 53 ईएफए (सबको शिक्षा) स्कूलों में पूर्व प्राथमिक कक्षाओं को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुपालन में अरुण, उदय और प्रभात नाम से अलंकृत किया गया है। श्री परमार ने कहा कि इस सारगर्भित संगोष्ठी के उपयोगी दृष्टिकोणों एवं संकल्पना को प्रदेश की शिक्षा पद्धति में लागू किया जाएगा।

पूर्व महानियामक, चिल्ड्रन यूनिवर्सिटी गुजरात श्री दिव्यांशु भाई दवे ने मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में "प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE ) स्वरूप एवं संकल्पना विषय पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि विश्व शांति की कुंजी माता के गर्भ में ही रही है। शिशु के समग्र विकास के लिए इंडीजीनियस झूला, लोरी और रसोई में शिशु की देखभाल जैसे पारंपरिक विकास प्रक्रिया को अमल में लाना होगा। मनुष्य का व्यक्तित्व पंच कोषात्मक है। शिशु की जड़ें मजबूत करनी होगी क्योंकि जड़ें जीवंत होती हैं और नींव निर्जीव। बच्चों को उनके अपने अनुभवों के आधार पर सिखाने की आवश्यकता है।

अध्यक्ष, पतंजलि संस्कृत संस्थान श्री भरत बैरागी, अध्यक्ष स्थायी पाठ्य पुस्तक निर्माण समिति म.प्र. श्री प्रकाश वर्तुनिया सहित अनेक शिक्षाविद, विद्या भारती के पदाधिकारीगण और विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित थे।

विद्या भारती मध्य प्रांत के पदाधिकारी श्री राम भावसार ने संचालन किया और नियंत्रक अधिकारी राज्य शिक्षा केंद्र (SCERT) श्री अशोक पारिख ने आभार माना।


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