एक अयातुल्लाह के भरोसे नहीं टिकी ईरान की सत्ता, जो ट्रंप बदल देंगे, एक्‍सपर्ट से समझें क्‍यों बदलाव मुश्किल

Updated on 11-03-2026 01:37 PM
शैलेंद्र पांडेय, तेहरान/नई दिल्‍ली: इसे डॉनल्ड ट्रंप की मासूमियत कह लीजिए या फिर नादानी कि उन्हें डिप्लोमेसी की मान्य भाषा नहीं आती। वह शब्दों को मर्यादा के कपड़े नहीं पहनाते, बस ऐसे ही मैदान में छोड़ देते हैं। करीब दो महीने पहले उन्होंने ईरान के लोगों को हिम्मत बंधाते हुए कहा था - मदद रास्ते में है। तब तेहरान की सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे तमाम लोगों के लिए ट्रंप उम्मीद का चेहरा बन गए थे। हालांकि ऐसा कोई वादा नहीं, जिसे तोड़ा न जा सके। तो वह 'मदद' पहुंची ही नहीं

आम लोगों को नुकसान


अब जब अमेरिका-इस्राइल की मिसाइलें पूरे ईरान में फट रही हैं, तब ट्रंप ने ईरानियों के लिए अपने शब्दों को बदल दिया है - सत्ता अपने हाथ में ले लीजिए। लेकिन कैसे? अयातुल्लाह अली खामेनेई और कथित परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने से शुरू हुई बमबारी के लक्ष्य अब तेल ठिकाने और पानी के प्लांट हैं। ईरान की सैन्य क्षमता को तो नुकसान पहुंच ही रहा है, पर बराबर क्षति वहां की जनता को भी उठानी पड़ रही है।

अमेरिका का भ्रम


पश्चिम एशिया में अमेरिका का हर अडवेंचर अभी तक मिस-अडवेंचर साबित हुआ है। ईरान में रेजीम बदलने की ट्रंप की ख्वाहिश पूरी होना इसलिए मुश्किल नहीं है क्योंकि इतिहास उनके खिलाफ खड़ा है, बल्कि इसलिए क्योंकि इतिहास-भूगोल तेहरान के साथ है। वॉशिंगटन ने हमेशा यह भ्रम बनाए रखने का प्रयास किया कि तेहरान की सत्ता मतलब अली खामेनेई। यह बात सच तो थी, पर वैसी नहीं जैसे इराक में सद्दाम हुसैन या लीबिया में गद्दाफी।

समाज में विविधता


इस्लामिक क्रांति के बाद बतौर सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह सबसे शक्तिशाली बनकर उभरे, लेकिन उन्होंने ऐसा स्ट्रक्चर भी खड़ा किया, जो उनके बाद भी चलता रहे। सत्ता, सेना और समाज - ये तीन स्तंभ मुख्य हैं, जिन पर ईरान टिका हुआ है। विविधताओं से भरे इस देश में विभिन्न जातीय और सांस्कृतिक समुदाय रहते हैं। सबसे बड़ी आबादी, करीब 61% फारसी लोगों की है। फिर अजरबैजानी, कुर्द, लूर, अरब वगैरह हैं। केवल यह समझना कि ईरान एक शिया मुस्लिम देश है और लोग इस्लामिक क्रांति के बाद आई कट्टरता के चलते व्यवस्था के विरोध में खड़े हो गए - मामले का सरलीकरण होगा।

काउंसिल और असेंबली


ईरान में दो व्यवस्थाएं समानांतर चलती हैं - धार्मिक और राजनीतिक। इनमें तालमेल बैठाने और सत्ता में इस्लामिक मूल्यों को लाने के लिए गार्जियन काउंसिल और असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स जैसी संस्थाएं हैं। गार्जियन काउंसिल के सदस्यों को धर्मगुरु और न्यायपालिका की सिफारिश से सांसद चुनते हैं। इसी तरह असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के 88 सदस्य चुने जाते हैं जनता के वोट से। इन संस्थाओं का ढांचा इस तरह बनाया गया है कि अगर सुप्रीम लीडर नहीं होते हैं, तो भी इनका काम जारी रहे, जैसा अभी हो रहा है।

IRGC की ताकत


इस व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी है इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की, जिसे इस्लामिक क्रांति के बाद सेना से अलग केवल इसी काम के लिए खड़ा किया गया था। लेकिन, आज यह आर्म्ड फोर्स ईरान की अर्थव्यवस्था की भी रीढ़ है। IRGC के पास तेल और गैस फील्ड हैं, इसकी कंपनी Khatam al-Anbiya Construction Headquarters पूरे देश में कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े काम करती है, इसकी हिस्सेदारी टेलीकॉम सेक्टर में है और इससे नैशनल बैंक अटैच्ड हैं जिनके जरिये पश्चिम के प्रतिबंधों को बाईपास किया जाता है।

लोकतंत्र पर हमला


किसी भी तरह का हवाई हमला इतने कॉम्प्लेक्स सिस्टम को तोड़ नहीं सकता और व्यवस्था में बदलाव तब तक संभव नहीं है, जब तक वहां के लोग न चाहें। लेकिन, यह जरूरी तो नहीं कि तेहरान को लेकर ट्रंप और ईरान के लोग एक जैसा सपना देख रहे हों। आखिरकार आज ईरान जिस स्थिति में है, उसके लिए अमेरिका ही जिम्मेदार है। ईरान की परेशानी 1979 की इस्लामी क्रांति से नहीं शुरू हुई। वह शुरू हुई 1953 से, जब अमेरिका ने दखल देकर मोहम्मद मोसादेग की चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करा दिया और अपने फायदे के लिए शाह को गद्दी पर बैठाया।
पुरानी अमेरिकी नीति । Monroe Doctrine से लेकर हालिया दखल तक - अमेरिका जब भी कहीं कूदा है, तो बस अपने फायदे के लिए। उसके Banana Wars ने कभी लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों को CIA की प्रयोगशाला बना दिया था, जिसका असर आज तक दिखता है। वही चीज पश्चिम एशिया में हो रही है। ट्रंप जितने मुंहफट हैं, आज नहीं तो कल वह इसे भी मान लेंगे।

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