1990 में आतंकियों ने मचाई थी तबाही, तोड़ दी थीं मूर्तियां, 36 साल बाद रामनवमी पर खुला श्रीनगर का रघुनाथ मंदिर

Updated on 26-03-2026 12:10 PM
श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर रघुनाथ मंदिर में 36 साल बाद रौनक लौटी है। 36 साल में पहली बार है जब यहां रामनवमी का आयोजन हो रहा है। फतेहकदल में झेलम नदी के किनारे स्थित ऐतिहासिक श्री रघुनाथ मंदिर को फूलों और रंग-बिरंगी लाइट्स से सजाया गया है। यहां घंटे- घड़ियाल बजे, मंत्रों का उच्चारण हुआ और भजन गूंजे। हवन हुआ और पूरा माहौल सुगंधित हो गया। 1990 में आतंकियों ने रघुनाथ मंदिर पर हमला बोला था, मंदिर को तबाह कर दिया था। कश्मीर पंडितों का पलायन हुआ और यह मंदिर तब से वीरान हो गया था। बीते 36 साल से इस मंदिर में सन्नाटा बिखरा था।

मंदिर में 36 साल बाद श्रद्धालु पहुंचे। भक्तों की भीड़ नजर आई और रामनवमी पर मंदिर में चहल-पहल दिखी। मेले जैसा माहौल नजर आया। यह वही मंदिर है, जिसे 1990 में आतंकियों ने तबाह कर दिया था। निजाम-ए-मुस्तफा का नारा देते हुए आतंकी मंदिर में घुसे। मंदिर को लूटा, मूर्तियां तोड़ीं और मूर्तियों को झेलम में फेंक दिया।

26 को शोभा यात्रा

जम्मू-कश्मीर धर्मार्थ ट्रस्ट राम नवमी के अवसर पर 26 मार्च को एक भव्य रथ यात्रा निकाली जाएगी। जम्मू-कश्मीर धर्मार्थ ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. परशोत्तम सिंह पठानिया ने बताया कि ट्रस्ट सनातन धर्म सभा और धार्मिक युवक मंडल ने भव्य रथ यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि शोभा यात्रा पारंपरिक मार्ग से ही निकली जाएगी। शोभा यात्रा की शुरुआत ऐतिहासिक श्री रघुनाथ जी मंदिर से होगी।

यहां से गुजरेगी शोभायात्रा

डॉ. पठानिया ने बताया कि शोभायात्रा 26 मार्च को शाम 4 बजे श्री रघुनाथ जी मंदिर परिसर में शोभा मूर्ति पूजन किया जाएगा, जिसके बाद रथ पूजन होगा। इसके बाद श्री रघुनाथ जी मंदिर से रथ यात्रा शुरू होगी। अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि रथ यात्रा श्री रघुनाथ जी मंदिर परिसर से शुरू होगी और रेजीडेंसी रोड, शहीदी चौक, राजिंदर बाजार, कनक मंडी, सिटी चौक, पुरानी मंडी, लिंक रोड, जैन बाजार, चौक चबूतरा, पक्का डंगा, मोती बाजार, गीता भवन और रणबीरेश्वर मंदिर से होकर गुजरेगी और फिर सिटी चौक, रघुनाथ बाजार की ओर बढ़ेगी और अंत में श्री रघुनाथ जी मंदिर में समाप्त होगी।

रघुनाथ मंदिर में भव्य आयोजन

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पार्टी प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने 36 वर्षों के अंतराल के बाद ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर हब्बा कदल के फिर से खुलने का स्वागत किया और इसे कश्मीर में शांति, सुलह और धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की वापसी का एक सशक्त प्रतीक बताया। श्रीनगर के हब्बा कदल क्षेत्र में स्थित यह मंदिर 26 मार्च, 2026, गुरुवार को राम नवमी के अवसर पर रघुनाथ मंदिर समिति द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह के साथ फिर से खुलने जा रहा है।

बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, बदल रहा कश्मीर

अपने बयान में ठाकुर ने कहा कि तीन दशकों से अधिक समय के बाद मंदिर का फिर से खुलना केवल एक धार्मिक घटना नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक क्षण है जो घाटी में बदलते माहौल को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह एक अत्यंत भावुक और महत्वपूर्ण अवसर है। रघुनाथ मंदिर का फिर से खुलना शांति, सद्भाव और सह-अस्तित्व का एक सशक्त संदेश देता है। उन्होंने जम्मू और कश्मीर में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के निरंतर प्रयासों की सराहना की।
भविष्य के प्रति आशा व्यक्त करते हुए भाजपा नेता ने कहा कि वह समय दूर नहीं जब कश्मीरी पंडित सम्मान और गरिमा के साथ घाटी लौटेंगे। मंदिरों का पुनः खुलना एक सकारात्मक कदम है। यह बढ़ती सुरक्षा और आत्मविश्वास की भावना को दर्शाता है। मुझे पूरा विश्वास है कि वह दिन निकट है जब हमारे कश्मीरी पंडित भाई-बहन सम्मान के साथ घर लौटेंगे। ठाकुर ने राम नवमी के अवसर पर लोगों को शुभकामनाएं भी दीं और आशा व्यक्त की कि यह त्योहार क्षेत्र में भाईचारे, शांति और सांप्रदायिक सद्भाव के बंधन को और मजबूत करेगा। दशकों तक अशांति के कारण बंद रहे इस मंदिर का पुनः खुलना घाटी की साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।

ऐतिहासिक है श्री रघुनाथ मंदिर

श्री रघुनाथ मंदिर कश्मीर में आतंकी हिंसा का दौर शुरु होने से पहले हिंदु समुदाय के सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। यह मंदिर श्रीनगर में है। मंदिर के विशाल परिसर में स्कूल और लाइब्रेरी भी हुआ करती थी। श्री रघुनाथ मंदिर घाटी के सबसे बड़े और भव्य मंदिरों में एक है। रघुनाथ जी मंदिर का निर्माण महाराजा गुलाब सिंह ने 1835 में शुरू कराया था। महाराजा गुलाब सिंह के निधन के बाद मंदिर का निर्माण उनके बेटे महाराजा रणबीर सिंह ने पूरा करवाया। मंदिर का निर्माण 1860 में पूरा हुआ था।

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