देश के एक्सपोर्ट पर हूती अटैक, दिसंबर में लगी 4 अरब डॉलर की चपत

Updated on 15-01-2024 02:11 PM
नई दिल्ली: स्वेज नहर संकट के चलते भारतीय एक्सपोर्ट को लगभग 4 अरब डॉलर महीने की चपत लगने लगी है। हालात जल्द नहीं सुधरे तो मुश्किल और बढ़ जाएगी क्योंकि ग्लोबल डिमांड में सुस्ती के चलते निर्यात पहले से घट रहा है। फ्रेट कॉस्ट लगभग दोगुनी हो जाने के बीच फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस (FIEO) ने यह चिंता जताई है। हालात को देखते हुए कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल की अध्यक्षता में मंगलवार को व्यापार बोर्ड की बैठक बुलाई गई है। इसमें निर्यात बढ़ाने के उपायों पर मंथन होगा। इसी हफ्ते कॉमर्स मिनिस्ट्री एक और बैठक करेगी, जिसमें रक्षा और विदेश सहित कई मंत्रालयों के अधिकारी शामिल होंगे। इसमें हूतियों के हमले से पड़ रहे असर को दूर करने के उपायों पर विचार होगा।

असर दूर करने के उपायों पर विचार


इसमें हूतियों के हमले से पड़ रहे असर को दूर करने के उपायों पर विचार होगा। मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल से नवंबर के बीच गुड्स एक्सपोर्ट सालभर पहले की इसी अवधि के मुकाबले 6.51% घटकर 279 अरब डॉलर पर आ गया था। एक्सपोर्टर्स का कहना है कि हूती आतंकवादियों के हमले शुरू होने से पहले रेड सी रूट पर 40 फुट के कंटेनर का भाड़ा 1400 से 1800 डॉलर था, जो अब 2600 से 3000 डॉलर हो गया है।

पड़ने वाला है असर


FIEO के डीजी और सीईओ डॉ अजय सहाय ने कहा, ‘रेड सी रूट से मिडल ईस्ट, नॉर्थ अफ्रीका और यूरोप को जाने वाले माल पर असर पड़ा है। दिसंबर के जो आंकड़े हैं, उसके मुताबिक करीब 4 अरब डॉलर महीने तक का असर पड़ने लगा है। दूसरे रूट्स पर भी फ्रेट रेट बहुत बढ़ गया है। बीमा कंपनियां भी कवर देने से मना करने लगी हैं।


ढुलाई की लागत बढ़ी


दिल्ली वेजिटेबल ऑयल ट्रेडर्स असोसिएशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सुरेश नागपाल ने बताया, ‘माल आने-जाने में 15-20 दिन ज्यादा लगने लगा है क्योंकि जहाज दूसरे रास्ते से जा रहे हैं। ढुलाई लागत करीब 15 डॉलर प्रति टन बढ़ गई है। नए सौदों में बढ़ी हुई फ्रेट और इंश्योरेंस कॉस्ट शामिल की जा रही है। इसका असर आने वाले दिनों में दिखेगा।’ सहाय ने कहा, ‘सरकार को बीमा कंपनियों से कहना चाहिए कि वे कवर देना जारी रखें और बढ़े हुए रिस्क के मुताबिक ही प्रीमियम बढ़ाएं।

एक दूरगामी उपाय यह है कि भारत को यूरोप, जापान, अमेरिका और चीन की तरह अपनी एक बड़ी शिपिंग लाइन डिवेलप करनी चाहिए। हम जो करीब 100 अरब डॉलर फ्रेट में हर साल देते हैं, उसको बचाने में इससे मदद मिलेगी।’

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