सरकार का तर्क:राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जवाब

Updated on 06-07-2025 02:19 PM

मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ तौर पर कहा है कि ट्रांसफर याचिकाओं पर अंतिम फैसला आने तक प्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण नहीं दिया जाएगा। शासन की ओर से सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने शुक्रवार को कोर्ट को बताया कि कानून पर स्टे नहीं है, लेकिन चूंकि अभी तक मप्र से स्थानांतरित होकर आईं याचिकाओं का निराकरण नहीं हुआ है, इसलिए ओबीसी का आरक्षण नहीं बढ़ाएंगे।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने सरकार के जवाब को रिकॉर्ड पर लेते हुए इस याचिका की सुनवाई छत्तीसगढ़ के प्रकरण के साथ करने की व्यवस्था दी।

जबलपुर के कीर्ति चौकसे, बालाघाट निवासी निश्चय सोन वर्षे व अन्य की ओर से याचिका दायर कर बताया गया कि वे ओबीसी वर्ग के हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में उनका चयन होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति नहीं दी जा रही है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने दलील दी कि 8 मार्च 2019 को सरकार ने अध्यादेश लाकर ओबीसी के लिए 27% आरक्षण निर्धारित किया था। विधानसभा ने 14 अगस्त 2019 को कानून बनाकर इसे लागू कर दिया। कानून पर कोई रोक नहीं है, इसके बावजूद सरकार उसे लागू नहीं कर रही है।

दलील दी गई कि छत्तीसगढ़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश के तहत 50% से अधिक आरक्षण को मंजूरी दी है। समानता के आधार पर मप्र में भी लागू करने की अनुमति दी जाए। इस पर सरकार ने विरोध किया और कहा कि मप्र के मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं।

अब तक क्या हुआ?

  • 8 मार्च 2019 : कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश लाकर 27% ओबीसी आरक्षण घोषित किया। इसके खिलाफ याचिका लगी और हाई कोर्ट ने 14% के आधार पर पीजी नीट में प्रवेश का आदेश दिया।
  • 14 अगस्त 2019: बिल विधानसभा में पास होकर कानून बना। अध्यादेश खत्म होकर एक्ट आ गया है, जो प्रभावी है।
  • 63 याचिकाएं कानून के खिलाफ, 35 पक्ष में दायर हुईं।
  • अक्टूबर 2019: कमलनाथ सरकार ने कोर्ट में जवाब दाखिल किया। साल 2020 से 2025 के बीच अगली भाजपा सरकार ने उसी जवाब को बनाए रखा। पेशियां बढ़ती रहीं।
  • 18 दिसंबर 2024: हाई कोर्ट ने पहली सुनवाई तय की, लेकिन बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर हो गया।
  • अब बहस इस बात पर है कि क्या 50% से ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं।

सरकार ने गेंद कोर्ट के पाले में डाली वरिष्ठ वकील रामेश्वर सिंह ठाकुर का कहना है, ‘2019 का कानून आज भी प्रभावी है। इस पर कोई स्टे नहीं है। सरकार चाहे तो 27% आरक्षण लागू कर सकती है। उसने फैसला लेने की बजाय मामला सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दिया है। असली हल तो तभी निकलेगा जब सुप्रीम कोर्ट की 11 जजों की बेंच इस पर अंतिम फैसला सुनाएगी।’

मप्र में 27% ओबीसी आरक्षण पर सरकार-विपक्ष आमने-सामने

सरकार आरक्षण से बचना चाहती है, वकीलों को दिए 50 करोड़ : पटवारी

पीसीसी चीफ जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि सरकार आरक्षण से बचना चाहती है। इसके लिए कोर्ट में वकीलों को 50 करोड़ रु. दिए। उन्होंने कहा, ‘26 फरवरी को हाई कोर्ट व 7 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि 27% आरक्षण पर कानूनी अड़चन नहीं है। फिर भी 25 जून को सुप्रीम कोर्ट को सरकार से यह सवाल पूछना पड़ा कि जब कोई रोक नहीं है तो आरक्षण लागू क्यों नहीं किया जा रहा।’ {नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि मुख्यमंत्री खुद पिछड़े वर्ग से हैं। फिर भी ओबीसी के हक को टाला जा रहा है।

कांग्रेस सरकार ने 4 लाइन में फैसला लागू किया, हम बिल लाएंगे : सीएम

सीएम डॉ. मोहन यादव बोले- ‘कांग्रेस केवल भ्रम फैला रही है। हमारी सरकार ओबीसी आरक्षण को लेकर प्रतिबद्ध है। इसके लिए बिल लाएंगे। तब कांग्रेस सरकार ने बिना किसी सर्वे और तैयारी के महज 4 लाइन का एक कागज लाकर आरक्षण लागू करने का नाटक किया था। मामला वर्षों से कोर्ट में अटका रहा। हमने अफसरों से कहा है कि वे सही आंकड़ों के साथ स्पष्ट कानून बनाकर विधानसभा में प्रस्तुत करें।’ 27% आरक्षण के तहत जो 14% मिल चुका है, उसके अलावा शेष वर्ग को कैसे लाभ मिले, इस पर काम हो रहा है।



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