
आज महाशिवरात्रि के पर्व पर देशभर के शिवमंदिरों में भक्तों की भीड़ है। मप्र की बात करें तो महाकालेश्वर हो या ओंकारेश्वर मंदिर देशभर से आए भक्त कतार में लगकर अपने आराध्य के दर्शन कर रहे हैं। शिव के इस महापर्व के मौके पर एक ही पत्थर पर बिना जोड़ बने इस अद्भुत और अकल्पनीय मंदिर का निर्माण ही उल्टे तरीके से हुआ है। यहां पहले मंदिर का शिखर बनाया गया, इसके बाद नींव का निर्माण हुआ। मंदिर में दर्शन के लिए आपको सुंरग से होते हुए जमीन के 9 फीट नीचे जाना होता है। हम बात कर रहे हैं मंदसौर के धर्म राजेश्वर मंदिर की।
पहले बात करते हैं कैसे पहुंच सकते हैं मंदिर
टीम मंदसौर से करीब 106 किलोमीटर धर्म राजेश्वर मंदिर स्थित भगवान शिव के दर्शन के लिए निकली। शामगढ़ से होते हुए चंदवास पहुंचते ही चिड़ियों की चहचहाहट के बीच ठंडी हवाओं के झोंके से प्रकृति की सुंदर अनुभूति हुई। गांव से करीब 7-8 फीट चौड़ा रास्ता, जिसमें हरियाली के बीच संतरे के बगीचे भी लहलहा रहे हैं, इसी से होते हुए हम एक छोटी सी पहाड़ी के समीप पहुंचे। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि यहां पर कोई मंदिर होगा।
पहाड़ी पर पहुंचते ही मंदिर नजर नहीं आने पर हमने वहां आए कुछ श्रद्धालुओं से जानकारी चाही। वे बोले- सामने जो सुरंग नजर आ रही है, उसी से आपको जाना पड़ेगा। मंदिर नीचे तल में है। मंदिर परिसर में घुसते ही पशु-पक्षियों की आवाजें तेज हो गईं। यहां कई बत्तखों के जोड़े घूम रहे थे। पेड़ के आसपास बनी जालियों में सैकड़ों खरगोश चहल-कदमी कर रहे थे। गिलहरियों के झुंड बिना डरे इर्द-गिर्द घूमने लगे।
सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचने पर दोनों बगल में बड़ी-बड़ी चट्टानों से बनी दीवारों के बीच करीब 5 फीट चौड़ा सुरंगनुमा गलियारा नजर आया। हम उसके भीतर घुसे और कुछ दूर चले तो मंदिर हमारी आंखों के सामने था। गर्भगृह में ऊपर भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा और तलघर में बड़ा सा शिवलिंग स्थापित है।
एक चट्टान को तराशकर बनाया, पूरे मंदिर में एक भी जॉइंट नहीं
मंदसौर के चंदवासा ग्राम के निकट एक छोटी सी पहाड़ी पर बना धर्म राजेश्वर अपने आप में इतिहास की कहानी खुद बयां करता है। मंदिर तक पहुचंने के बाद ये स्थान खासा आकर्षक और रोचक लगने लगता है। मंदिर की खासियत यह है कि इसे एक चट्टान को तराशकर बनाया गया है। पत्थर को इस प्रकार से तराशा गया है कि मंदिर में एक भी जोड़ नहीं हैं। इस मंदिर तक पहुचंने के लिए आपको 9 मीटर जमीन की तह में जाना होता है। जहां मुख्य मंदिर के आसपास सात छोटे मंदिर हैं। इनमें अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां विराजित हैं। मंदिर के बायीं ओर ढेरों गुफाएं हैं, जिनमें बौद्ध की विभिन्न मुद्राओं में प्रतिमाएं आज भी इतिहास बयां कर रही हैं।
यह मंदिर सप्तायन शैली में बना
मंदिर का निर्माण लेटराइट पत्थर पर हुआ है। मंदिर 54 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा और 9 मीटर की गहराई में स्थित है। मंदिर के द्वार पर मंडप, शिखर और गर्भगृह निर्मित है, जिसे पिरामिड का आकर दिया गया है। वहीं, मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा के साथ शिवलिंग विराजित हैं। पिरामिड आकार के बने इस मंदिर की दीवारों पर भगवान गणेश, लक्ष्मी, पार्वती, कालका, गरुड़ महाराज की विराजित हैं।
मंदिर के बारे में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं है, लेकिन इतिहासकार मंदिर के निर्माण को 8वीं शताब्दी का मानते हैं। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर सप्तायन शैली में बना हुआ है। इस मंदिर काे राष्ट्रकूट नरेशों द्वारा बनवाया गया है। हालांकि इतिहासकारों की इसे लेकर एक राय नहीं है। हां वे इसे रॉक टेंपल (रॉक कट का मतलब होता है पत्थर की चट्टान को तराशकर की गई कारीगरी) जरूर बताते हैं। ऐसा माना जाता है कि धर्म राजेश्वर का यह मंदिर सुप्रसिद्ध एलोरा के कैलाश मंदिर के समान है।
आस्था अज्ञातवास में पांडवों ने किया निर्माण, तर्क बौद्धकालीन मंदिर
बौद्ध इतिहास को दर्शाते इस स्थान के मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु और शिवलिंग स्थापित हैं। इसी के आसपास के सात मंदिरों में भी हिन्दू देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित हैं। इसी लिहाज से स्थानीय लोगों की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है। भक्तों का मानना है कि मंदिर की आधारशिला पांडवों ने रखी थी। किंवदन्ती है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान भीम ने इस मंदिर का निर्माण किया था। यहां की गुफाओ में भीम गुफा का नाम इसी लिहाज से पड़ा था।
आज भी लोग इसे पांडवों द्वारा निर्मित मंदिर ही मानते हैं। हालांकि इतिहासकार इसे जैन और बौद्ध धर्म से जुड़ा हुआ मंदिर कहते हैं। इस स्थान का नाम धर्म राजेश्वर होने के चलते भी लोग पांडवों के बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर के नाम से इसे जोड़कर देखते हैं। कहते हैं कि मंदिर का निर्माण पहले हुआ, जिसे पांडवों ने बनाया। बाद में बौद्ध अनुयायियों ने गुफाओं का निर्माण करवाया।
मंदिर के गर्भगृह में पहुंचती है सूरज की पहली किरण
मंदिर पुजारी लालूनाथ योगी की माने तो मंदिर को पांडवों ने बनाया था। अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने छह महीने दिन रात तराशकर एक चट्टान पर मंदिर का निर्माण किया था। इसकी खास बात यह है कि पत्थर को ऊपर से काटकर नीचे की ओर लाया गया है। शिखर से नींव की ओर इसका निर्माण हुआ है। इस तरह से तराशा गया है कि जमीन से करीब 30 फीट नीचे बने इस मंदिर में सूर्य उदय की पहली किरण सीधे मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करती है। मान्यता है कि सूर्यदेव सबसे पहले भगवान शिव और विष्णु के दर्शन करते हैं।
नंदी बिना शिव-विष्णु के साथ होने से बना हरिहर मंदिर
योगी बताते हैं कि मंदिर में विष्णु और शिवलिंग स्थापित है। पूरे मंदिर में नंदी की प्रतिमा नहीं है। इसलिए यह हरिहर मंदिर है। हरि का मतलब भगवान-विष्णु और हर से महादेव है। यहां शिवरात्रि को दर्शन करने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
बौद्ध गुफाओं में बाजार, कचहरी और स्तूप आज भी मौजूद
धर्म राजेश्वर मंदिर के ठीक नीचे पहाड़ी के निचले छोर पर करीब 170 छोटी-बड़ी गुफाएं हैं। बताया जाता है कि कर्नल टॉड ने इन्हें सबसे पहले देखा था। हालांकि इनमें से अधिकांश गुफाएं देखरेख के अभाव में अपना वजूद खोने की कगार पर हैं। हालांकि करीब 60 से अधिक गुफाएं अब भी बहुत अच्छी स्थिति में हैं। इन गुफाओं में सैकड़ों बौद्ध स्तूप के साथ अलग-अलग मुद्राओं में बौद्ध प्रतिमाएं हैं। सैकड़ों छोटी बड़ी बौद्ध प्रतिमाओं में जीवनकाल और दिनचर्या से जुड़ी मुद्राओं का बखूबी चित्रण किया गया है।
पहाड़ी के इर्द-गिर्द भी कई बौद्ध स्तूप बने हैं। कामिनी महल, भीम बाजार, छोटी कचहरी, बड़ी कचहरी, विभिन्न गुफाओं अलग-अलग नाम से जाना जाता है। पाषाण शैली की बेजोड़ शिल्पकारी को देखकर लगता है कि ये किसी सिद्धहस्त कारीगरों के इंजीनियरिंग का नमूना है। यहां के सैकड़ों बौद्ध स्तूप और बौद्ध प्रतिमाओं की वजह से इतिहासकार इसे बौद्धकालीन रॉक कट टेंपल भी कहते हैं।
महाशिवरात्रि पर तीन दिन का मेला, तंत्र क्रिया का स्थान भी
जंगल के बीच पहाड़ी पर बने धर्म राजेश्वर मंदिर में शिवरात्रि के पर्व पर तीन दिवसीय मेला लगता है। ग्राम पंचायत द्वारा मेले का आयोजन होता है। शिवरात्रि के दिन ही करीब एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु मंदिर में भगवान विष्णु और भोले बाबा के दर्शन करते हैं। मंदिर से श्रद्धालुओं की आस्था इस कदर जुड़ी है कि शिवरात्रि के दिन सुबह से रात तक यहां श्रद्धालु जुटते हैं।
मंदिर परिसर में रातभर जगाकर श्रद्धालु यहां भजन कीर्तन करते हैं। इसके पीछे श्रद्धालुओं का अपना मत भी है। उनका मानना है कि यहां रातभर जागकर भगवान शिव की आराधना करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, जिसने एक बार भी यहां शिवरात्रि के दिन रात में शिव आराधना की हो, उसका मोक्ष निश्चित है।
शिखर से शुरू हुए इस पौराणिक मंदिर में तंत्र क्रिया का भी विशेष महत्व है। तांत्रिक क्रियाओं के लिए भी पंडित इसे श्रेष्ठ मंदिर बताते हैं। कहा जाता है कि मंदिर की परिकल्पना मस्तक से शुरू होकर पैरों की ओर जाती है। मस्तक ब्रह्मांड के समान होता है। लिहाजा यहां तंत्र क्रियाओं का अपना महत्व है। हालांकि इस तरह के कोई प्रमाण यहां मौजूद नहीं है।
टूट रहा मंदिर, बेजोड़ शिल्पकला को बचाने की जरूरत
देश के अलौकिक मंदिरों में से एक चंदवासा स्थित यह धर्म राजेश्वर मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीनस्थ है। पुरातत्व विभाग ही मंदिर की देखरेख करता है। मंदिर का अधिकांश हिस्सा जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। इस विरासत को बचाए रखने के लिए सरकारी स्तर पर कोई खास प्रयास अब तक नहीं किए गए। अपने आप में इतिहास समेटे यह मंदिर बेहतरीन पर्यटक स्थल है, लेकिन अब तक इसके प्रयास भी नाकाफी रहे है।
पर्यटकों के लिए यहां कोई खास सुविधाएं मौजूद नहीं हैं, लेकिन फिर भी इतिहास को जानने और इसमें दिलचस्पी रखने वाले पर्यटक यहां पहुंचते हैं। इतिहासकार भी मानते है कि सरकार प्रयास करे तो यह स्थान बेहतरीन पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो सकता हे।
ऐसे पहुंच सकते हैं धर्म राजेश्वर मंदिर
मंदसौर जिला मुख्यालय से धर्म राजेश्वर मंदिर की दूरी करीब 106 किलोमीटर है। यहां सड़क और रेल मार्ग दोनों से पहुंचा जा सकता है। सबसे निकटतम स्टेशन शामगढ़ और गरोठ है। शामगढ़ से मंदिर की दूरी 21 किलोमीटर है तो गरोठ से करीब 30 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से यहां तक पहुंचने के सुगम साधन उपलब्ध हैं। साथ ही मंदसौर शामगढ़ से टैक्सी भी हर समय उपलब्ध होती है। वन क्षेत्र होने से मंदिर में रात ठहरना मुश्किल है, लेकिन शामगढ़ और मंदसौर में रुकने के लिए अच्छे साधन हैं।