हर घर होगा सोलर एनर्जी से रोशन, 3 मई को पीएम मोदी कर सकते हैं लोकार्पण

Updated on 21-02-2023 07:31 PM

मध्यप्रदेश की राजधानी से सटे रायसेन जिले का सांची कस्बा देश की दूसरी सोलर सिटी बनने जा रही है। सांची में घरों से लेकर गलियां, स्ट्रीट लाइट, चौराहे यहां तक कि यहां का स्तूप भी सोलर लाइट से रोशन होंगे। बौद्ध स्तूपों के लिए दुनिया भर प्रसिद्ध सांची को अब सोलर सिटी के नाम से पहचाना जाएगा। अलग-अलग कंपनियों ने यहां सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू कर दिया है। अगले दो महीनों में सांची को सोलर सिटी बनाने का काम पूरा हो जाएगा। पीएम नरेंद्र मोदी इसका लोकार्पण कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें आमंत्रण भी भेजा गया है।

जानिए, सांची कैसे बनेग्रिड कनेक्टेड जमीन आधारित सोलर परियोजनाः होगी।

घरों पर लगेंगे रूफ टॉप सोलर सिस्टम: हैं।

घरों को मिलेंगे सोलर उपकरण
सांची को सोलर सिटी बनाने में जन भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हर घर को- कुछ न कुछ ऑफ-ग्रिड सौर संयंत्र दिए जाएंगे। जैसे- सोलर कुकर, सोलर स्टडी लैंप, सोलर ड्रायर, सोलर वॉटर हीटर, सोलर लालटेन जैसे उपकरण मुहैया कराए जाएंगे। साथ ही, इन उपकरणों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इन संयंत्रों को विभिन्न संस्थाओं से प्राप्त CSR और व्यक्तिगत सामाजिक उत्तरदायित्व (ISR) के तहत योगदान द्वारा वित्तीय सहायता दी गई है।

ऊर्जा मंत्री हरदीप सिंह डंग ने बताया- विश्वभर में जलवायु परिवर्तन के कारण चुनौतियां पैदा हो रही हैं। इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेट जीरो की परिकल्पना की थी। उसी दिशा में मप्र के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने सांची को सोलर सिटी बनाने का काम शुरू किया है। इसमें जनता का भी सहयोग मिल रहा है। घर की लाइट से लेकर कूलर, पंखा, फ्रिज समेत तमाम आइटम सोलर लाइट के जरिए संचालित होंगे। इसके लिए घरों की छत पर सोलर प्लेट लगाई जा रही हैं। जिस घर की छत पर सोलर लाइट नहीं लग सकती, वहां कनेक्शन देंगे। सोलर रूफ टॉप में सब्सिडी मिल रही है। 3 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसका उद्घाटन कर सकते हैं।

घरेलू कनेक्शन के हिसाब से मिलेगा सोलर रूफ टॉप

नवकरणीय ऊर्जा विभाग के अफसरों ने बताया कि सोलर सिटी प्रोजेक्ट के तहत घरों में सोलर रूफ टॉप उपलब्ध कराए जाएंगे। घर में जितनी क्षमता के विद्युत कनेक्शन हैं, उतनी कैपेसिटी से ज्यादा का सोलर रूफ टॉप उपलब्ध कराए जाएंगे। उदाहरण के तौर पर यदि घरेलू विद्युत कनेक्शन 5 किलोवाॅट का है, तो इतनी क्षमता का सोलर रूफ टॉप मिल सकेगा। घरेलू सोलर रूफ टॉप लगवाने के लिए हितग्राही को 60% अंशदान देना होगा। इसके अलावा सरकार की ओर से 40 % सब्सिडी दी जाएगी।

जानिए, किस नेट जीरो के तहत सोलर सिटी बनाने की दिशा में शुरू हुआ काम

अमेरिका समेत कई यूरोपीय देश लगातार 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन टारगेट हासिल करने की बात करते रहे हैं। नेट जीरो का अर्थ है कि सभी देशों को जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए कार्बन न्यूट्रेलिटी यानी कार्बन उत्सर्जन में तटस्थता लानी है। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि कोई देश कार्बन उत्सर्जन को शून्य पर पहुंचा दे (जो कि असंभव है), बल्कि नेट जीरो का अर्थ है कि किसी भी देश के उत्सर्जन का आंकड़ा वायुमंडल में उसकी ओर से भेजी जा रही ग्रीन हाउस गैसों के जमाव को स्थिर रखे।

नेट जीरो एमिशन क्या है?

नेट जीरो एमिशन का मतलब ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन शून्य करना नहीं है, बल्कि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को दूसरे कामों से बैलेंस करना। कुल मिलाकर एक ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करना, जिसमें फॉसिल फ्यूल का इस्तेमाल ना के बराबर हो। कार्बन उत्सर्जन करने वाली दूसरी चीजों का इस्तेमाल भी बहुत कम हो।

कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि आप जितना कार्बन पैदा कर रहे हैं उतना ही उसे एब्जॉर्ब करने का इंतजाम आपके पास होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर पेड़-पौधे हवा से कार्बन डाईऑक्साइड एब्जॉर्ब करते हैं।

अगर किसी कंपनी के कारखाने से कार्बन की एक निश्चित मात्रा का उत्सर्जन होता है और कंपनी इतने पेड़ लगाती है, जो उतना कार्बन एब्जॉर्ब कर सके तो उसका नेट एमिशन जीरो हो जाएगा। इसके साथ ही कंपनियां पवन एवं सौर ऊर्जा संयंत्र लगाकर भी इसी प्रकार का लाभ पा सकती हैं। यही बात देश के लिए भी लागू होती है।

अगर किसी देश में कार्बन उत्सर्जन से ज्यादा कार्बन एब्जॉर्प्शन के सोर्स हैं तो उसका नेट एमिशन निगेटिव हो जाएगा। अभी दुनिया में सिर्फ दो देश भूटान और सूरीनाम ऐसे हैं जिनका नेट एमिशन निगेटिव है। इसकी बड़ी वजह इन देशों में मौजूद हरियाली और कम आबादी है।

इसलिए की जा रही है नेट जीरो की बात

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर मौजूदा तरीके से ही ग्रीन हाउस गैसों का एमिशन होता रहा, तो 2050 तक धरती का तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर कहीं भीषण सूखा पड़ेगा तो कहीं विनाशकारी बाढ़ आएगी। ग्लेशियर पिघलेंगे, सुमद्र का जल स्तर बढ़ेगा। इससे समुद्र के किनारे बसे कई शहर पानी में डूब जाएंगे और उनका नामोनिशान मिट जाएगा।

धरती का तापमान नहीं बढ़े इसीलिए ये सारी कवायद हो रही है। हाल ही में संपन्न हुए G-20 समिट में इसमें शामिल देशों में 2050 तक धरती के तापमान की इस बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सीमित रखने पर सहमति बनी है।

... तो क्या है नेट जीरो का लक्ष्य
वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान का जीवन ही कार्बन पर निर्भर है। मनुष्य के शरीर से लेकर उसके आसपास मौजूद चीजें भी कार्बन और अन्य तत्वों के जोड़ से बनी हैं। यानी कार्बन उत्सर्जन को खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन जिस स्तर पर मौजूदा समय में इसका उत्सर्जन हो रहा है, उसे नियंत्रण में लाया जा सकता है। इसका मतलब, कोई देश वातावरण में कार्बन आधारित ग्रीन हाउस गैसों का जितना उत्सर्जन कर रहा है, उतना ही उसे सोख और हटा भी रहा है। यानी उसकी तरफ से वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का योगदान न के बराबर हो। इसी को नेट जीरो कहा जाता है।

कैसे हासिल हो सकता है लक्ष्य
इसे उदाहरण के जरिए समझना ज्यादा बेहतर रहेगा। दुनिया में जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहनों (कार, बस, जहाज, आदि) और फ्रिज, एसी में बढ़ते सीएफसी के इस्तेमाल की वजह से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी ज्यादा हुआ है। इस बढ़ते उत्सर्जन को हरे-भरे जंगलों के जरिए कम किया जा सकता है। पेड़ जो कि कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर ऑक्सीजन छोड़ते हैं, वे ग्रीन हाउस गैसे उत्सर्जन को कम कर सकते हैं। इसके अलावा कुछ और भविष्य की तकनीकों के जरिए उत्सर्जन पर लगाम लगाई जा सकती है।

यह तकनीकें जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को कम करने में भी इस्तेमाल हो सकती हैं। मसलन, सूर्य से मिलने वाली सौर ऊर्जा का इस्तेमाल अब हर तरह की मशीन को चलाने में हो रहा है। इसके अलावा, बिजली और ग्रीन फ्यूल से चलने वाले वाहनों पर भी जोर दिया जा रहा है।

इनकी वजह से प्रदूषण के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आ सकती है और कई देश जितना ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान दे रहे हैं, उसे जीरो तक या निगेटिव स्तर तक भी पहुंचा सकते हैं। मौजूदा समय में भूटान और सूरीनाम दो देश हैं, जो कि नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर चुके हैं, क्योंकि वे जितना कार्बन छोड़ रहे हैं, उससे ज्यादा उन्हें सोख लेते हैं।


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