दुख में रोना नहीं और सुख में रुकना नहीं... पढ़ें पद्मश्री पाने वाले सीदी समुदाय की हीराबाई लोबी से बातचीत

Updated on 28-01-2023 06:40 PM
इस बार पद्मश्री पाने वालों में एक नाम हीराबाई लोबी का है। जूनागढ़, गुजरात में तलाला तहसील है, जिसके मधुपुर जंबूर गांव में हीराबाई लोबी रहती हैं। इन्हें सीदी समुदाय सहित आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और बच्चों को शिक्षित करने के लिए सम्मानित किया गया है। इस्लाम को मानने वाले सीदी समुदाय के लोगों को अफ्रीका से भारत बतौर गुलाम लाया गया था। गांव के सरपंच विमल भाई वदोदरिया कहते हैं, 'हीराबाई को पद्मश्री मिलने से आसपास के गांवों में भी जश्न का माहौल है। सीदी समुदाय में ही नहीं, सभी समुदायों में खुशी है।' हीराबाई लोबी खुद भी सीदी समुदाय की हैं और इनके पुरखे सदियों पहले नाइजीरिया से आए थे। गुजरात में
कलीम सिद्दीकी ने ठेठ ग्रामीण गुजराती बोलने वाली हीराबाई लोबी से बात की। पेश हैं अहम अंश :

अपने और अपने गांव के बारे में कुछ बताइए।
बचपन में ही मेरे माता-पिता का देहांत हो गया था। दादी ने मुझे पाला। मेरे पति भी खेत मजदूर थे। तीन-चार साल पहले उनका देहांत हो चुका है। दो बेटे हैं, एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है और दूसरा खेत मजदूर है। एक बेटी है, वह भी खेत मजदूरी करती है। हमारा गांव मधुपुर जंबूर है। यह दो गांव हैं मगर ग्राम पंचायत और सरपंच एक है। जंबूर में अधिकतर लोग सीदी समुदाय के हैं। सीदी समुदाय सामाजिक ही नहीं आर्थिक तौर पर भी कमजोर है। अधिकतर खेतों में मजदूरी ही करते हैं।
    आप भी खेत मजदूर रही हैं, ऐसे में समाज सेवा का ख्याल कैसे आया?
    जब मैं खेत में मजदूरी करती थी, तो सोचती थी कि ऐसा क्या करूं कि सभी बहनें आत्मनिर्भर बनें। हमारे यहां आगा खान फाउंडेशन गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए काम कर रहा था। मैं इससे जुड़ गई। महिला सखी मंडल बनाना सीखा। फिर अलग-अलग महिला मंडल बनाकर समुदाय की महिलाओं के साथ रोजगार पैदा करने शुरू किए। जब मैंने समाज सेवा शुरू की, पूरे जूनागढ़ जिले में सखी मंडल के बारे में कोई नहीं जानता था। अब हम लोग खाद बनाते हैं। मैं खुद भी यही काम करती हूं। जो महिलाएं पशुपालन करना चाहती हैं, उन्हें लोन दिलाती हूं। कुछ महिलाएं नीम का तेल वगैरह भी बनाती हैं। हम लोग आरोग्य का भी काम करते हैं। शिक्षा में भी काम करते हैं। 2004 में हमने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिला विकास फाउंडेशन बनाया।
    समाज सेवा में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
    हमारे गांव में बड़ी आबादी अनुसूचित जनजाति की है। अधिकतर खेत मजदूर हैं। कुछ समुदाय आपस में बहुत लड़ते हैं। एक-दूसरे के खिलाफ केस करने पुलिस स्टेशन पहुंच जाते हैं। हम लोग बहुत मुश्किल से सुलह करवाते हैं। समझा-बुझाकर रोजगार पर ध्यान देने के लिए जागरूक करते हैं। समाज के बच्चों को बुरी आदतों से बचाकर शिक्षा की तरफ लाना भी चुनौती भरा काम है। जब हमने काम शुरू किया था, तब लोगों के बैंकों में खाते भी नहीं हुआ करते थे।

    जीवन में आप किसी को रोल मॉडल मानती हैं?
    जवाहर लाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी मेरे लिए रोल मॉडल हैं। वह महिला होकर पूरे देश को संभाल सकती हैं तो हमारे जैसी महिलाएं आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन सकतीं? मेरी दादी भी मेरी रोल मॉडल हैं। अपनी दादी से मैंने संघर्ष करना सीखा है। मेरी दादी कहती थीं, 'दुख जोई ने रड़वु नहीं। सुख देखी ने रूकवू नहीं।' यानी दुख में रोना नहीं और सुख देखकर रुकना नहीं।
    आपको पद्मश्री सम्मान मिला है, क्या कहना चाहेंगी?
    'मने तो बहु गम्यो मोदी साहेबे मारी कदर कीधी।' (मुझे बहुत अच्छा लगा, मोदी साहब ने मेरी अहमियत को समझा)। मोदी जी जब मुख्यमंत्री थे तो जूनागढ़ में मेरा सम्मान किया था। मगर मुझे नहीं पता था कि पद्मश्री कितना बड़ा सम्मान है। बेटे आयुद्दीन लोबी ने बताया कि यह बहुत बड़ा सम्मान है। मेरा सपना था कि मैं अपने गांव में आदिवासी समाज की महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करूं। अब तक हम लोगों ने चौदह गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। भरोसा था कि काम करूंगी तो एक दिन सरकार की नजर में जरूर आएगा। इससे पहले मुझे यूरोप के एक देश (स्विट्जरलैंड) ने सम्मान दिया था। उसमें मुझे 500 डॉलर भी मिले थे। अंबानी भाइयों ने भी मुझे सम्मानित किया था। जानकी देवी बजाज सम्मान भी मिल चुका है। अब बस दो अधूरे सपने हैं। मैं चाहती हूं सरकार मुझे जमीन का एक टुकड़ा दे, जहां मैं आदिवासी महिलाओं के लिए रोजगार तालीम केंद्र खोल सकूं। दूसरा, किसी को जंगल में न रहना पड़े। सभी को मकान मिले। सोनिया गांधी से मिलने का भी सपना था। मगर यहां के कांग्रेसी नेताओं ने उनसे कभी मिलने ही नहीं दिया।

    आपने आजादी के बाद का भारत देखा और इसे बदलते देखा। तब कैसा था माहौल और अब कैसा है?
    मेरा बचपन गरीबी में बीता। ऐसा नहीं है कि अकेले हम ही गरीब थे। पूरा समुदाय ही गरीब था। जंगलों में फूस की झोपड़ी में लोग रहा करते थे। अब तो पक्के मकान हैं। सरकार ने जब आदिवासियों को जमीनें दीं तो लोग खेती करने लगे। बहुत से लोगों ने जमीनें बेच डालीं तो सरकार ने कानून बनाया कि सीदी समुदाय की जमीन कोई खरीदेगा तो उसे वापस लौटानी होगी। सरकार ने तो समाज को आगे लाने के लिए बहुत किया, लेकिन जागरूकता न होने के कारण समाज आगे नहीं आ पाया। इंदिरा गांधी और मोदी साहब को छोड़ दें तो बीच की सरकारें बहुत अच्छा नहीं कर पाईं। आज के समय में नई पीढ़ी अपने अधिकारों को लेकर जागरूक है। पहले के लोगों को बहुत-कुछ बताना पड़ता था। पहले और अब के दौर में जमीन-आसमान का फर्क है।

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