बिहार के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के सामने आने वालीं हैं ये बड़ी चुनौतियां, नकल मुक्त एग्जाम 'अग्निपरीक्षा'

Updated on 24-11-2025 01:53 PM
पटना: राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिस गृह और शिक्षा विभाग को अपनी देख रेख और निगरानी में रखा, उसके हाल में सुधार जरूर आया, पर कुछ जमीनी हकीकत ने एनडीए सरकार की फजीहत करा डाली। शिक्षा के सवाल पर तो राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता, संसाधनों की कमी और घटिया परीक्षा व्यवस्था के कारण सरकार पर सवाल तो खड़े होते रहे हैं। कई बार तो शर्मसार होना पड़ा है। वह चाहे बोर्ड के टॉपर छात्र की अज्ञानता हो या फिर दीवार चढ़ कर नकल कराने वाली तस्वीर। ये एक ऐसी चुनौती है, जिसे भविष्य के चौखट पर मजबूत करना इस सरकार की मजबूरी भी है। शिक्षा की बागडोर संभाले शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के लिए इस बार सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और बेहतर परीक्षा प्रणाली होगी। इसमें सुधार करना इतना आसान नहीं है। विभाग को कई स्तरों पर इस समस्या से जूझना होगा। आइए जानते हैं, किन-किन स्तरों पर काम करने की जरूरत है।


शिक्षक और छात्र अनुपात

शिक्षा को बेहतर करने के लिए सबसे पहले सरकार को शिक्षक-छात्र अनुपात में सुधार लाना होगा। हाल के दिनों में विभाग से शिक्षक और छात्र का कोई डेटा जारी नहीं किया गया है। लेकिन शिक्षकों की संख्या में घपलाबाजी जरूर हो रही है।
राइट टू एजुकेशन फोरम के संयोजक अनिल कुमार कहते हैं कि शिक्षकों की संख्या में घाल मेल हो रहा है। राज्य सरकार संविदा पर बहाल शिक्षकों में से एक बड़ी संख्या बीपीएससी शिक्षक की हुई। अब यह कोई नहीं बहाली तो है नहीं। फिर शिक्षकों की संख्या में बढ़ोत्तरी कहां हुई।
वहीं पुराने डेटा की बात करें तो बिहार को अभी 63 छात्रों पर एक शिक्षक के औसत से अभी काफी ऊपर उठना होगा। हालांकि टीईटी परीक्षा के द्वारा गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की संख्या को लगातार बढ़ाने की कोशिश हुई है। शिक्षकों की बहाली अभी पाइप लाइन में भी है।

पूर्णकालिक शिक्षकों की कमी

बेहतर शिक्षा के लिए संविदा पर शिक्षकों से बात नहीं बन रही है। अनुबंध पर नियुक्त शिक्षकों को कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा के कारण पढ़ाने में पूरी संलिप्तता नहीं हो पाती। फिलहाल राज्यकर्मी के दर्जा के साथ शिक्षकों को प्रोन्नत किया जाने लगा है। पर अभी भी यह संख्या काफी कम है। शिक्षा विभाग की सबसे बड़ी चुनौती पूर्णकालिक शिक्षक की काफी जरूरत है।

बिहार में लगातार बंद हो रहे स्कूल

बिहार में शिक्षा की बदहाली का सबसे बड़ा कारण लगातार सरकारी स्कूलों का बंद होते जाना भी है। एक अनुमान के तौर पर बिहार में 4.5 हजार स्कूल बंद हो गए हैं। इनमें 1773 स्कूल के बंद होने का तो नोटिफिकेशन बिहार सरकार ने जारी भी की। वैसे बिहार सरकार ने 8 हजार स्कूलों को बंद करने के लिए चिह्नित किया है। और बड़ी चालाकी से सरकार टुकड़ों-टुकड़ों में स्कूल बंद कर रही है। पहले स्कूल सेंट्रली बंद होते थे। लेकिन अब जिला स्तर पर बंद होने के कारण समग्रता में डेटा प्राप्त नहीं हो रहा है।

नकल मुक्त परीक्षा

इस सरकार के लिए कदाचार (नकल) मुक्त परीक्षा सबसे बड़ी चुनौती है। बोर्ड परीक्षाओं में नकल और पेपर लीक की घटना ने बिहार की शिक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए जाते हैं। पिछले वर्ष नकल करने के कुछ ऐसे दृश्य विश्व मीडिया को प्रभावित कर गए। शिक्षा मंत्री के लिए सबसे जरूरी है कि बेहतर परीक्षा व्यवस्था बनाना।

अपर्याप्त स्कूल भवन

आम तौर पर स्कूल के पास भवन तो है, वह काफी सुविधा विहीन है। स्कूलों में कक्षाओं की कमी, बिजली, शौचालय की कमी तो है साथ इसके साफ पेयजल की किल्लत तो है। स्कूल भवनों का निर्माण अक्सर स्कूल प्रबंध समितियों (SMC) की ओर से किया जाता है, जो तकनीकी रूप से सक्षम नहीं होतीं, जिसके परिणामस्वरूप खराब गुणवत्ता वाले भवन बनते हैं। इसमें बदलाव की जरूरत है

प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय

ग्रामीण स्कूलों में आधुनिक प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों के अभाव में आज भी कई स्कूलों में प्रैक्टिकल परीक्षा नहीं होती। केवल मौखिक परीक्षा लेकर परिणाम निकाले जाते हैं। स्कूलों में सुविधाओं का भरपूर अभाव है। सबसे लेटेस्ट जो रिपोर्ट है, उसके अनुसार, स्कूली सुविधा में बिहार सबसे पीछे है। स्कूली सुविधा की रेटिंग के अनुसार, 100 में से बिहार को 11.1 मार्क्स मिला है।

ASER की रिपोर्ट क्या कहती है?

ASER (वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट) रिपोर्ट 2024 के मुताबिक, अन्य राज्यों की तरह बिहार के स्कूलों में भी सीखने की प्रगति की गति धीमी है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों में कक्षा-5 के छात्रों के पढ़ने का स्तर 2024 में बढ़कर 44.8 प्रतिशत हो गया, जबकि बिहार में यह 41.2 प्रतिशत है, जो 2022 में 37.1 फीसदी से ज्यादा है।

राष्ट्रीय स्तर पर दो वर्ष की अवधि के दौरान बिहार में 6.3% अंक का सुधार हुआ है। अंकगणित में 36.2 फीसदी बच्चे एक अंक के विभाजन द्वारा सरल तीन अंकों को हल कर सकते हैं, जो 2018 में 29.9% और 2022 में 35.6% से ज्यादा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी स्कूलों में सीखने का स्तर ऊंचा बना हुआ है। राज्य में कक्षा के अनुरूप पढ़ाई एक चुनौती बनी हुई है। कक्षा-3 में केवल 26.3 फीसदी बच्चे, कक्षा 2 का सरल पाठ पढ़ सकते हैं, जो 2022 में 19.8% से ज्यादा है। जबकि 2022 में 28.8 फीसदी की तुलना में केवल 37.5 प्रतिशत बच्चे साधारण घटाव कर पाते हैं।

कई स्तरों पर सुधार की जरूरत

शिक्षा विभाग के मंत्री सुनील कुमार के सामने बेहतर बिहार, सुशिक्षित बिहार, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा वाला बिहार बनाना है, तो शिक्षक छात्र अनुपात, स्कूली संसाधन, शौचालय, पीने योग्य पानी जैसे मसले पर गंभीरतापूर्ण विचार करना होगा। साथ ही बच्चों के भोजन व्यवस्था पर निगरानी की जरूरत है। नहीं तो कही खाने में छिपकली तो कही कॉकरोच मिलने जैसी घटनाओं के आगे विभाग को शर्मसार होना पड़ता रहेगा।

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