भोपाल एम्स में विदेशी फॉर्मूले की जगह अब 'देसी मानक' से होगा सटीक इलाज, दवाओं के साइड इफेक्ट पर लगेगा अंकुश

Updated on 23-02-2026 12:02 PM

भोपाल। अभी तक किसी बीमारी के उपचार में मरीज को दवा की कितनी खुराक देनी है यह अमेरिका और यूरोप के चिकित्सा मानकों (गाइडलाइंस) पर के आधार पर तय होता है। जल्दी ही यह मानक बदलने वाला है। भोपाल का अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) अब भारतीयों की शारीरिक बनावट, खान-पान और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दवाओं के नए मानक तैयार करेगा।

संस्थान का तकनीकी संसाधन केंद्र मुख्य रूप से बच्चों की खांसी, स्टेम सेल चिकित्सा, थायराइड (हाइपोथायरायडिज्म) और साइनसाइटिस के इलाज के लिए राष्ट्रीय मानक विकसित कर रहा है। एम्स विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीयों की प्रतिरोधक क्षमता और जेनेटिक संरचना यूरोपीय-अमेरीकी देशों के लोगों से अलग होती है।

विदेशी मानकों के आधार पर दवा देने से कई बार भारतीय मरीजों को जरूरत से अधिक मात्रा हो जाती है। इसके विपरीत प्रभाव (साइड इफेक्ट) शरीर पर पड़ते हैं।

इसके अलावा विदेशी मानकों के कारण कई बार ऐसी महंगी दवाएं या टेस्ट लिखे जाते हैं जिनकी भारतीय परिस्थितियों में जरूरत ही नहीं होती। इससे मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और इलाज लंबा खिंचता है। एम्स की इस पहल से अब यह वैज्ञानिक रूप से तय होगा कि भारतीय बच्चों को इन चार बीमारियों में दवा की कितनी खुराक देनी चाहिए और उपचार कितने दिनों तक चलना चाहिए।

उदाहरण के लिए बच्चों की खांसी के लिए कफ सीरप का चयन अब और अधिक सुरक्षित और सटीक होगा। एम्स भोपाल का तकनीकी संसाधन केंद्र, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के तहत इस नई परियोजना पर काम कर रहा है।

त्रासदी साबित हुई है ओवरडोज

पिछले वर्ष छिंदवाड़ा-बैतूल जिलों में एक खास ब्रांड के कफ सीरप के सेवन से 25 बच्चों की मौत हो गई थी। शुरुआती जांच में यह तथ्य सामने आए थे कि दो साल से भी कम उम्र के बच्चों को दवा की आवांछित खुराक दी गई थी। जिसकी वजह से उनकी किडनी को नुकसान पहुंचा। बाद में दवा अमानक भी पाई गई।

पिछले दिनों इंदौर में एक बच्चे को मामूली खांसी-जुकाम होने पर परिजनों ने बिना डाक्टर से पूछे कफ सिरप दे दिया था। दवा देने के कुछ ही देर बाद बच्चे की हालत बिगड़ गई और उसे बचाया नहीं जा सका। जांच में सामने आया कि सीरप में मौजूद तत्वों ने बच्चे के श्वसन तंत्र को सुस्त कर दिया था।

यह होता है नुकसान

मौजूदा मानकों से तय की गई दवा भारतीय बच्चों के लिए अक्सर ओवरडोज साबित होती है। इससे बच्चों में अत्यधिक सुस्ती, सांस लेने की गति का धीमा होना और हृदय गति में असमान्यता जैसे खतरनाक लक्षण देखे गए हैं।

पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में भारतीयों का मेटाबालिज्म (पाचन और ऊर्जा प्रक्रिया) अलग होता है। ऐसे में हाइपोथायरायडिज्म के लिए मौजूदा मानकों पर दवा लेने से उनमें घबराहट, अनिद्रा और समय से पहले हड्डियों के कमजोर होने (आस्टियोपोरोसिस) जैसी शिकायतें बढ़ रही हैं।

साइनसाइटिस जैसे रोगों में विदेशी प्रोटोकाल के तहत हैवी एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं। इससे भारतीयों के पेट में मौजूद गुड बैक्टीरिया (जो पाचन में सहायक होते हैं) खत्म हो जाते हैं, जिससे पाचन तंत्र स्थायी रूप से कमजोर हो जाता है।

शरीर में दवाओं की जरूरत से ज्यादा मात्रा पहुंचने के कारण बैक्टीरिया उनके प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, जिससे भविष्य में साधारण संक्रमण होने पर भी दवाएं असर करना बंद कर देती हैं। (जैसा परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया)

नये मानक से यह होगा फायदा

सटीक इलाज, खर्च में कमी, कम साइड इफेक्ट, एक समान उपचार।



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