असम चुनाव: 'चाय वालों' के सहारे कांग्रेस को ही पटखनी देने की तैयारी में JMM, हेमंत सोरेन का मास्टर स्ट्रोक

Updated on 25-03-2026 12:08 PM
रांची: असम चुनाव में एक बार फिर साबित हो गया कि विपक्षी एकता की बैठकें सिर्फ टी-पार्टी हैं, हकीकत से इसका कुछ लेने-देना नहीं है। अब तो इंडिया गठबंधन शब्द, अपने आप में एक मजाक बन गया है। जो दल जहां मजबूत है वह अपने छोटे सहयोगी दलों की इज्जत नहीं करता। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को दरकिनार कर दिया। जेएमएम बिहार में चुनाव नहीं लड़ सका। अब असम में कांग्रेस ने जेएमएम को भाव नहीं दिया। सीटों का समझौता नहीं हो सका। लेकिन हेमंत सोरेन ने बिहार वाली गलती नहीं दोहरायी। अब वे असम में पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं और 21 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार भी दिये हैं। जिन 21 सीटों पर जेएमएम के उम्मीदवार हैं उनमें 17 पर उनका मुकाबला कांग्रेस से है।


अब असम में भी गूंजेगा जल, जंगल और जमीन का नारा

हेमंत सोरेन असम के ट्री-ट्राइब के भरोसे चुनाव मैदान में उतरे हैं। एक अनुमान के मुताबिक असम में टी- ट्राइब की आबादी करीब 45 लाख है। कुछ अनुमानों में इनकी 70 लाख तक आंकी गयी है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम चुनाव में जनजातीय भावनाओं को जगाने की मुहिम शुरू कर दी है। उसका स्लोगन है- दूरी कितनी भी हो रिश्ता माटी का है। जल, जंगल और जमीन का नारा अब असम की वादियों में भी गूंजने वाला है। जेएमएम ने कहा है कि वह चाय बागान के श्रमिक भाई बहनों को सम्मान और हक दिलाने के लिए ही चुनाव लड़ रहा है। गुरुजी (शिबू सोरेन) के सपनों का न्याय अब असम के मजदूर के घर पहुंचेगा।

झारखंड के संताल, मुंडा और उरांव अब हैं असम के टी-ट्राइब

असम के चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों को टी- ट्राइब (चाय बागान मजदूर) कहते हैं। असम में इनकी आबादी 45 लाख से 70 लाख के बीच मानी जाती है। इनमें करीब 48 फीसदी मजदूर झारखंड मूल के माने जाते हैं। ब्रिटिश काल में इनके पूर्वजों को चाय बागान में काम करने के लिए झारखंड से असम लाया गया था। बोलचाल की भाषा में इन्हें ‘चाय जनजाति’ कहा जाता है। असम में चाय जनजाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में अधिसूचित किया गया है। इनकी आबादी ऊपरी असम के तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, शिवसागर चरादेई, गोलाघाट, लखीमपुर, उदलगुरी, सोनितपुर और करीमगंज जिलों में है। झारखंड के संताल, मुंडा और उरांव जनजाति के लोग असम के चाय बागानों में काम करते हैं। लेकिन असम में इन्हें जनजाति नहीं माना जाता। इसलिए उन्हें एसटी वर्ग की सरकारी सुविधाएं नहीं मिलतीं। हेमंत सोरेन ने अब इस हकमारी को अपना चुनावी मुद्दा बनाया है। इसलिए वे पुस्तैनी मिट्टी का वास्ता दे कर आदिवासी समुदाय को न्याय दिलाने की बात कर रहे हैं।

कांग्रेस पहले से कमजोर, अब जेएमएम ने बढ़ायीं मुश्किलें

पिछले 10 साल में कांग्रेस असम में बहुत कमजोर हुई है। इसमें दल बदल भी एक बड़ा कारण है। आज जो भाजपा के मुख्यमंत्री हैं हिमंत बिस्वा सरमा, वे कभी असम कांग्रेस के दिग्गज नेता हुआ करते थे। लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की खामियों के कारण वे भाजपा में चले गये। 2026 के चुनाव में कमजोर हो चुकी कांग्रेस और भी मुश्किल में फंस गयी है क्योंकि उसके वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए जेएमएम मैदान में उतर चुका है। ऊपरी असम के वे चाय बागान मजदूर जो, झारखंड मूल के हैं, वे हेमंत सोरेन के पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं। चूंकि अभी तक झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम में चुनाव नहीं लड़ा था, इसलिए उन्हें अपने पुरखों के प्रति प्रेम दिखाने का मौका नहीं मिला था। लेकिन अब ये मौका है जिससे कांग्रेस और भाजपा, दोनों को नुकसान हो सकता है।

राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता दिलाने के मकसद से भी चुनाव लड़ रहे हैं हेमंत सोरेन

झारखंड से असम में आया आदिवासी समूह लंबे समय से अपने लिए जनजातीय दर्जा की मांग कर रहा हैं। लेकिन असम के मूल आदिवासी इस मांग का विरोध करते रहे हैं। इसलिए कभी कभी इनमें हिंसक लड़ाई भी हो जाती है। ऊपरी असम के चाय बागान मजदूर पहले कांग्रेस के समर्थक थे। बाद में इनका झुकाव भाजपा की तरफ हो गया। अब तक के चुनावी नतीजों का यह निष्कर्ष रहा कि जिस भी दल को ऊपरी असम में अधिकतम सीटें मिलती हैं, सरकार उसी की बनती है। 2001 से लेकर 2016 तक ऊपरी असम में कांग्रेस को अधिक सीटें मिली। सरकार कांग्रेस की बनी। 2016 और 2021 में ऊपरी असम में भाजपा ने ज्यादा सीटें जीतीं। सरकार भाजपा की बनी। इसलिए सभी दल इस क्षेत्र में बढ़त लेने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। झामुमो के कारण इस बार कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। वैसे हेमंत सोरेन अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता दिलाने के मकसद से भी असम चुनाव लड़ रहे हैं। इसलिए उन्हें वोट प्रतिशत से अधिक मतलब है। अगर जीत मिल गयी तो सोने पर सुहागा।

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