मध्य प्रदेश के 100 से ज्यादा गांवों में शादी पर अनोखी परंपरा, अपने ही घर से विदा नहीं हो पातीं बेटियां

Updated on 30-06-2026 04:19 PM

 इंदौर। मध्य प्रदेश के कई गांव आज भी ऐसी परंपरा का पालन कर रहे हैं, जिसने सैकड़ों परिवारों की खुशियों पर विराम लगा दिया है। यहां यदि गांव में हत्या या कोई गंभीर अप्रिय घटना हो जाए तो तब तक किसी भी तरह का मांगलिक कार्य नहीं होता, जब तक आरोपी पक्ष के परिवार में शादी नहीं हो जाती। इस मान्यता के कारण कई परिवारों को अपनी बेटियों की शादी गांव से बाहर कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

टकनेरी गांव में डेढ़ साल से नहीं बजी शहनाई

अशोकनगर जिले के टकनेरी गांव में करीब डेढ़ वर्ष पहले एक महिला की हत्या के बाद से गांव में कोई भी शादी या अन्य शुभ कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। स्थानीय परंपरा के अनुसार, ऐसी घटना के बाद पूरे गांव में मांगलिक कार्यों पर रोक मानी जाती है। यही वजह है कि गांव में लंबे समय से शहनाई की गूंज सुनाई नहीं दी।

गरीब परिवारों के लिए बढ़ी मुश्किलें

आदिवासी बहुल इस गांव में ब्राह्मण, रघुवंशी, यादव और अहिरवार समाज के लोग भी निवास करते हैं। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार शहरों में मैरिज गार्डन या बैंक्वेट हॉल बुक कर शादी कर लेते हैं, लेकिन सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए यह आसान नहीं है। ऐसे लोगों को गांव की सीमा से बाहर किसी दूसरे गांव या कस्बे में विवाह समारोह आयोजित करना पड़ता है।

बेटी की विदाई के लिए गांव छोड़ना पड़ा

हाल ही में मेहरबान सिंह की बेटी का विवाह भी इसी परंपरा की भेंट चढ़ गया। परिवार चाहता था कि बेटी की विदाई अपने घर के आंगन से हो, लेकिन सामाजिक मान्यता के चलते उन्हें गांव से बाहर पंवारगढ़ में विवाह समारोह करना पड़ा। बताया जा रहा है कि इस शादी सीजन में गांव के 9 से 10 परिवार इसी तरह बाहर जाकर अपने बच्चों की शादी करा चुके हैं।

100 से अधिक गांवों में कायम है यह परंपरा

यह स्थिति केवल टकनेरी गांव तक सीमित नहीं है। लोगों का कहना है कि जिले के 100 से ज्यादा गांव आज भी इस परंपरा का पालन कर रहे हैं। किसी हत्या या अन्य गंभीर घटना के बाद गांवों में लंबे समय तक शादी-ब्याह और अन्य मांगलिक कार्यक्रम नहीं होते। ऐसे में परिवारों को दूसरे गांवों, कस्बों या शहरों में जाकर विवाह समारोह आयोजित करना पड़ता है।

बदलते समय में उठ रहे सवाल

यह परंपरा अब सामाजिक चर्चा का विषय बन चुकी है। कई लोगों का मानना है कि इसका सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और बेटियों की शादी पर पड़ता है। ऐसे में बदलते दौर में इस तरह की सामाजिक मान्यताओं पर पुनर्विचार और समाधान की आवश्यकता महसूस की जा रही है।



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